एजुकेशनमध्य प्रदेश

टैगोर नाट्य महोत्सव के पहले दिन गूंजा टैगोर का संगीत और रंगमंच, संतोष चौबे ने कहा- विश्व प्रेम और मानवीय चेतना टैगोर के चिंतन का आधार

भोपाल में चार दिवसीय ‘टैगोर नाट्य महोत्सव का शुभारंभ, पहले दिन गूंजा गुरुदेव का संगीत और रंगमंच

भोपाल। टैगोर राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय एवं विश्व रंग फाउंडेशन के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित चार दिवसीय ‘टैगोर नाट्य महोत्सव’ का रविवार को शुभारंभ हुआ। रबीन्द्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय के मुक्ताकाश में आयोजित पहले दिन के कार्यक्रम में टैगोर के गीतों की सांगीतिक प्रस्तुति, उनकी कहानियों पर आधारित नाट्य प्रस्तुति और ‘टैगोर की सांस्कृतिक चेतना’ विषय पर परिचर्चा हुई। कार्यक्रम में आरएनटीयू के कुलाधिपति और वरिष्ठ साहित्यकार संतोष चौबे, कुलगुरु डॉ. आर.पी. दुबे, कुलसचिव डॉ. संगीता जौहरी, टैगोर राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के निदेशक विनय उपाध्याय, संतोष कौशिक एवं विकास अवस्थी सहित साहित्य, रंगमंच और कला क्षेत्र से जुड़े लोग उपस्थित रहे।

महोत्सव के पहले दिन टैगोर राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के नवांगतुक विद्यार्थियों ने ‘गीतांजलि’ की प्रस्तुति दी। विद्यार्थियों ने टैगोर के गीतों को संगीत के माध्यम से प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया। इसके बाद विद्यालय के द्वितीय वर्ष के विद्यार्थियों ने टैगोर की दो कहानियों पर आधारित नाट्य प्रस्तुति ‘एक रात/अंतिम रात’ का मंचन किया।

‘एक रात’ में एक ऐसे युवक की कहानी है, जो बचपन की सहचरी सुरबाला के प्रेम को समय रहते समझ नहीं पाता। अपनी महत्वाकांक्षाओं के चलते वह उससे विवाह का अवसर खो देता है और बाद में उसे एहसास होता है कि जिसे वह प्रेम करता था, उसे वह स्वयं अपने जीवन से दूर कर चुका है। एक रात के घटनाक्रम में अतीत की स्मृतियां और पछतावा उसके सामने इस तरह उभरते हैं कि उसके जीवन और प्रेम का पूरा अर्थ बदल जाता है।

अंतिम रात’ में भी टैगोर मानवीय रिश्तों, प्रेम, भावनात्मक द्वंद्व और जीवन के निर्णायक क्षणों को केंद्र में रखते हैं। दोनों कहानियों को मंच पर जोड़कर प्रस्तुत करने से प्रस्तुति में प्रेम, पछतावे और मानवीय संवेदनाओं की गहरी परतें उभरकर सामने आती हैं। प्रस्तुति में विद्यार्थियों के अभिनय, संवाद और मंचीय अनुशासन ने दर्शकों को प्रभावित किया। टैगोर की संवेदनशील कहानियों को रंगमंच की भाषा में प्रस्तुत करने का प्रयास प्रस्तुति की खासियत रहा।

इसके बाद ‘टैगोर की सांस्कृतिक चेतना’ विषय पर परिचर्चा आयोजित की गई। वरिष्ठ साहित्यकार संतोष चौबे ने परिचर्चा की अध्यक्षता की। इस दौरान उन्होंने कहा कि थिएटर बहुत उपयोगी चीज है। भारतीय आधुनिकता को दोबारा परिभाषित करने की जरूरत है। कबीर भारतीय आधुनिकता के प्रतीक हैं और टैगोर भी आधुनिक भारत के महत्वपूर्ण प्रतीक हैं।

उन्होंने कहा कि टैगोर के चिंतन में अद्वैत की झलक दिखाई देती है। वे सीमाओं से परे एक ऐसे विश्व की बात करते हैं, जहां मनुष्य को संकीर्ण सीमाओं में नहीं बांधा जाए। टैगोर का मानना था कि हमें मानवीय चेतना के साथ काम करना चाहिए। उन्होंने कहा कि कबीर के भीतर भी अंतरराष्ट्रीयता और विश्व प्रेम दिखाई देता है।

विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. आर.पी. दुबे ने सभी अतिथियों, कलाकारों, विद्यार्थियों एवं आयोजन से जुड़े सहयोगियों के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि ऐसे आयोजन विद्यार्थियों को साहित्य, रंगमंच, संगीत और भारतीय सांस्कृतिक परंपरा से जोड़ने के साथ उनकी प्रतिभा को अभिव्यक्ति का अवसर देते हैं। बताया कि देश में आईसेक्ट समूह के छह विश्वविद्यालय संचालित हो रहे हैं, जो शिक्षा के साथ कला, संस्कृति और साहित्य के क्षेत्र में भी विभिन्न गतिविधियों को बढ़ावा दे रहे हैं।

अगले तीन दिन होंगे संतोष चौबे की कहानियों के नाम

टैगोर नाट्य महोत्सव के तहत 7, 8 और 9 सितंबर को संतोष चौबे की तीन कहानियों पर आधारित नाट्य प्रस्तुतियां होंगी। तीनों प्रस्तुतियां शाम 7 बजे से अंजनी सभागार, रवीन्द्र भवन, भोपाल में आयोजित की जाएंगी।

7 सितंबर: गरीब नवाज

8 सितंबर: उनके हिस्से का प्रेम और लेखक बनाने वाले

9 सितंबर: सतह पर तैरती उदासी
इन नाट्य प्रस्तुतियों के माध्यम से साहित्य और रंगमंच के संगम को दर्शकों के सामने प्रस्तुत किया जाएगा।

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