चार काली श्रम संहिताओं के खिलाफ 1 अप्रैल 2026 को ट्रेड यूनियनों ने मनाया काला दिवस



केंद्रीय ट्रेड यूनियनों और स्वतंत्र फेडरेशनों और एसोसिएशनों के राष्ट्रीय मंच के आह्वान पर आज 1 अप्रैल को पूरे देश के साथ समूचे प्रदेश में भी काला दिवस मनाया गया। यह दिन केंद्र सरकार द्वारा चार काली श्रम संहिताओं के कार्यान्वयन हेतु केंद्रीय नियमों की अधिसूचना के लिए पहले से घोषित तिथि है। ट्रेड यूनियनों का संयुक्त मोर्चा, मध्यप्रदेश ने एक विज्ञप्ति में बताया कि आज प्रदेश में भोपाल, इंदौर, जबलपुर, ग्वालियर,गुना,उज्जैन, शहडोल, अनूपपुर, रीवा, सतना, सिंगरौली, सागर, रायसेन, बैतूल, छिंदवाड़ा, सौंसर, बालाघाट, डिंडोरी, कटनी, सीधी, महूगंज, नागदा, रतलाम, नीमच, खरगौन, मंदसौर, सीहोर, राजगढ़, मुरैना, श्योपुर, भिंड, दमोह, मंडला, होशंगाबाद, देवास, छतरपुर, डिंडोरी, नरसिंहपुर, विदिशा आदि जिलों में श्रमिकों ने काली पट्टी पहनकर विरोध प्रदर्शन किया। जगह जगह जुलूस व अन्य कार्रवाईयां की गई। भोपाल में इस अवसर पर हुई विरोध कार्रवाई में इंटक, एटक, एचएमएस, सीटू, एआईयूटीयूसी, सेवा तथा बैंक, बीमा, बीएसएनएल व केन्द्रीय कर्मचारियों के संगठन शामिल हुए। अन्य शहरों में भी संयुक्त कार्यक्रम हुए।
विज्ञप्ति में कहा गया है कि ट्रेड यूनियनें लगातार इन श्रम-विरोधी, नियोक्ता-समर्थक श्रम संहिताओं का विरोध करती रही हैं, जिन्हें तथाकथित ‘श्रम सुधार’ और “ईज़ ऑफ दूइंग बिजनेस” के नाम पर लाया गया है। 12 फरवरी की ऐतिहासिक आम हड़ताल के बाद भी केंद्र सरकार इन श्रम संहिताओं को वापस लेने या इस मुद्दे पर केंद्रीय ट्रेड यूनियनों के साथ कोई सार्थक बैठक करने से बच रही है।
इसके अलावा, इन संहिताओं के मसौदा तैयार करने के चरण से ही ट्रेड यूनियनों जैसे हितधारकों से कोई परामर्श नहीं किया गया। इतने गंभीर मुद्दे पर, जो देश के कार्यबल के जीवन से जुड़ा है, लंबे समय से भारतीय श्रम सम्मेलन भी नहीं बुलाया गया। यह अंतरराष्ट्रीय श्रम मानकों का उल्लंघन है, जिनके प्रति भारत एक राष्ट्र के रूप में प्रतिबद्ध है।
ये श्रम संहिताएँ देश के श्रमिकों—जो संपत्ति के वास्तविक सृजनकर्ता हैं—को फिर से ब्रिटिश औपनिवेशिक काल जैसी शोषणकारी परिस्थितियों में धकेलने का प्रयास हैं। श्रमिक वर्ग ने औपनिवेशिक काल में अत्यधिक शोषण के खिलाफ और स्वतंत्र भारत में भी 8 घंटे के कार्यदिवस, कार्यस्थल सुरक्षा, यूनियन बनाने और संगठित होने के अधिकार, सामूहिक सौदेबाजी, आंदोलन करने और हड़ताल के अधिकार के लिए संघर्ष किया है। उन्होंने सम्मानजनक वेतन, सामाजिक सुरक्षा, ठेका श्रमिकों के नियमितीकरण, स्थायी कार्यों में ठेका प्रथा समाप्त करने, समान काम के लिए समान वेतन, बोनस, ग्रेच्युटी और पेंशन के अधिकार के लिए भी लड़ाई लड़ी है।
विज्ञप्ति में कहा गया है कि मजदूरों के संघर्ष के चलते हमने 1926 के ट्रेड यूनियन अधिनियम के माध्यम से यूनियन बनाने के अधिकार को वैधानिक मान्यता दिलाई। ब्रिटिश काल में हमारे पूर्वजों के संघर्ष से कई श्रम कानून बने, और स्वतंत्र भारत में संसद द्वारा कुल 44 केंद्रीय श्रम कानून तथा राज्यों द्वारा लगभग 150 कानून बनाए गए, क्योंकि श्रम भारतीय संविधान की समवर्ती सूची में शामिल है। ये सभी उपलब्धियाँ लगभग 150 वर्षों के संघर्ष का परिणाम हैं।
वर्तमान केंद्र सरकार इन श्रम संहिताओं के माध्यम से इन उपलब्धियों को समाप्त करने की दिशा में कदम बढ़ा रही है। इन संहिताओं में ऐसे कठोर और दमनकारी प्रावधान हैं, जिनसे यूनियन बनाना कठिन, पंजीकरण मुश्किल और निरस्तीकरण आसान हो जाएगा। नियोक्ताओं के उल्लंघनों को अपराध की श्रेणी से बाहर किया जा रहा है, जबकि ट्रेड यूनियन गतिविधियों को दंडनीय बनाया जा रहा है। कार्य समय की सीमा को खुला छोड़ दिया गया है, जिससे उसे मनमाने ढंग से बढ़ाया जा सके। हड़ताल का अधिकार लगभग समाप्त कर दिया गया है।
फिक्स्ड टर्म रोजगार को सामान्य बनाया जा रहा है, मौजूदा सामाजिक सुरक्षा कानूनों को कमजोर किया जा रहा है और सार्वभौमिक सामाजिक सुरक्षा के झूठे दावे के बावजूद अधिक श्रमिकों को इसके दायरे से बाहर रखा जा रहा है। सुरक्षा मानकों से समझौता किया जा रहा है और 17 क्षेत्रीय श्रम कानूनों को समाप्त कर बड़ी संख्या में श्रमिकों को व्यावसायिक सुरक्षा और स्वास्थ्य के अधिकार से वंचित किया जा रहा है।
न्यूनतम वेतन कानूनों को कमजोर कर गरीबी रेखा से नीचे ‘राष्ट्रीय न्यूनतम वेतन’ लागू करने की कोशिश की जा रही है। ये संहिताएँ संगठित क्षेत्र को असंगठित बनाने और असंगठित श्रमिकों को अधिकारों से वंचित करने की दिशा में हैं। इनमें कई प्रावधान भारतीय संविधान की भावना, अंतरराष्ट्रीय श्रम मानकों और मानवाधिकारों के विरुद्ध हैं।
ऐसी स्थिति में ट्रेड यूनियनों और श्रमिक संगठनों के पास इन श्रम संहिताओं के खिलाफ संघर्ष जारी रखने और उनके क्रियान्वयन के खिलाफ प्रतिरोध खड़ा करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। मोर्चा ने श्रमिकों, किसानों और अन्य नागरिकों को सलाम कर लंबी लड़ाई के लिए तैयार रहने का आह्वान किया।



