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हिज्बुल्लाह को ईरान से बड़ा दुश्मन मानता है इजरायल? सीजफायर के बावजूद बमबारी

अमेरिका और ईरान के बीच सीजफायर डील के बाद मिडिल ईस्ट में एक देश को छोड़कर बाकि जगह एक हद तक हिंसा रुक गई है- वह देश लेबनान है जिसपर इजरायल ने 30 सालों में सबसे बड़ा हमला किया है. इजरायल ईरान के खिलाफ जंग रोकने पर तो सहमत हो गया है लेकिन लेबनान में उसने तबाही मचा दी है. इजरायल का दावा है कि वह लेबनान में बसे हिज्बुल्लाह को निशाना बना रहा है. इजरायल ने दस मिनट के भीतर बेरूत, बेका घाटी और दक्षिणी लेबनान में 100 से अधिक हिज्बुल्लाह कमांड सेंटर और सैन्य स्थलों को निशाना बनाने का दावा किया है. 24 घंटे के अंदर-अंदर पूरे लेबनान में कुल 254 लोग मारे गए हैं और 1,100 से अधिक लोग घायल हुए हैं.

सवाल है कि जो लेबनान में बसे हिज्बुल्लाह के लड़ाके इजरायल के लिए ईरान से भी बड़े खतरे कैसे हो गए? चलिए आपको 7 प्वाइंट में बताते हैं.

  1. आम तौर पर ईरान को इजरायल का सबसे बड़ा दुश्मन माना जाता है, क्योंकि उसके पास परमाणु कार्यक्रम, बैलिस्टिक मिसाइलें और बड़ा सैन्य ढांचा है. लेकिन इजरायली सुरक्षा विशेषज्ञों के अनुसार कई मामलों में लेबनान स्थित हिज्बुल्लाह इजरायल के लिए ज्यादा तत्काल और खतरनाक चुनौती बन गया है। इसका मुख्य कारण उसकी भौगोलिक स्थिति, बड़ी संख्या में रॉकेट-मिसाइल, युद्ध की अलग रणनीति और ईरान के साथ उसका गहरा सैन्य संबंध है। नीचे कुछ प्रमुख कारण दिए गए हैं जिनकी वजह से इजरायल हिज्बुल्लाह को ईरान से भी बड़ा खतरा मानता है।
  2. इजरायल और ईरान के बीच लगभग 1000 किलोमीटर की दूरी है, जबकि हिज्बुल्लाह सीधे इजरायल की उत्तरी सीमा (लेबनान) पर मौजूद है. इसका मतलब है कि अगर ईरान हमला करता है तो इजरायल के पास तैयारी के लिए कुछ समय मिल सकता है. लेकिन हिज्बुल्लाह के रॉकेट या ड्रोन हमले के मामले में चेतावनी का समय बहुत कम होता है. इस वजह से इजरायल को लगता है कि उत्तरी इजरायल के शहर और बस्तियां हमेशा तत्काल खतरे में रहती हैं.
  3. हिज्बुल्लाह को दुनिया के सबसे बड़े गैर-राज्य सैन्य संगठनों में से एक माना जाता है. यानी एक ऐसा संगठन जो देश नहीं होने के बावजूद इस तादाद में हथियार रखता हो. अनुमान के अनुसार उसके पास 1.2 लाख से 2 लाख तक रॉकेट और मिसाइलें हो सकती हैं. हाल के संघर्षों में उसे कुछ नुकसान जरूर हुआ है, लेकिन फिर भी उसके पास हजारों रॉकेट मौजूद हैं जो इजरायल को निशाना बना सकते हैं. इतनी बड़ी संख्या किसी भी समय बड़े पैमाने पर हमले की क्षमता देती है.
  4. ईरान की बैलिस्टिक मिसाइलें बहुत शक्तिशाली हो सकती हैं, लेकिन उनकी संख्या सीमित होती है और उन्हें इजरायल मानता है कि अपने आयरन डोम एयर डिफेंस सिस्टम से रोक सकता है. इसके विपरीत, हिज्बुल्लाह एक साथ सैकड़ों छोटे रॉकेट और ड्रोन दागने की रणनीति अपनाता है. इससे इजरायल का आयरन डोम बहुत दबाव में आ जाता है. लगातार हमलों से इस सिस्टम पर आर्थिक और सैन्य दबाव भी बढ़ता है. ऐसा लगता है कि ईरान ने इस मामले में हिज्बुल्लाह से सीख ली है. इस बार की जंग में ईरान ने सस्ते आत्मघाती ड्रोन (जैसे शाहेद ड्रोन) का खूब इस्तेमाल किया है.
  5. हिज्बुल्लाह के पास एक स्पेशल यूनिट है जिसे “रदवान फोर्स” कहा जाता है. इसे खास तौर पर सीमा पार कर इजरायल के अंदर घुसपैठ करने के लिए प्रशिक्षित किया गया है. इनका लक्ष्य इजरायली बस्तियों पर कब्जा करना और लोगों या सैनिकों को बंधक बनाना हो सकता है. कुछ रिपोर्टों के अनुसार यह बल उत्तरी इजरायल के इलाकों में घुसने की क्षमता दिखा चुका है, जो इजरायल के लिए गंभीर सुरक्षा चिंता है.
  6. पहले हिज्बुल्लाह के ज्यादातर रॉकेट साधारण होते थे, लेकिन अब उसने सटीक-निर्देशित (Precision-guided) मिसाइलें भी विकसित कर ली हैं. इन मिसाइलों से बिजली संयंत्र, सैन्य मुख्यालय और अन्य महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे को सटीक निशाना बनाया जा सकता है. इससे इजरायल के रणनीतिक ठिकानों को ज्यादा खतरा पैदा होता है.
  7. हिज्बुल्लाह को अक्सर ईरान की “फर्स्ट लाइन ऑफ डिफेंस” माना जाता है. अगर इजरायल कभी ईरान के परमाणु ठिकानों पर हमला करता है, तो हिज्बुल्लाह को जवाबी हमले के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है. इस तरह हिज्बुल्लाह ईरान के लिए एक तरह की “बीमा पॉलिसी” की तरह काम करता है, जिससे इजरायल को दो मोर्चों के खतरे का सामना करना पड़ सकता है.

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