विदेश

ईरान सिर्फ वार्ता के लिए जिंदा vs ट्रंप 40 दिनों की हार याद करें

कतर ने ईरान-अमेरिका युद्ध में मध्यस्थता से इनकार किया तो पाकिस्तान ने सक्रिय भूमिका निभाने की जिम्मेदारी ली

रूस, चीन, यूरोप तो छोड़िए हर देश का युद्ध रुकवाने में मध्यस्थ बनने वाले कतर ने भी ईरान-अमेरिका युद्ध में पड़ने से इनकार कर दिया, मगर पाकिस्तान ने खुद से आगे बढ़कर जिम्मेवारी ले ली. 15 दिनों का युद्धविराम भी हो गया, मगर अब जब स्थायी शांति के लिए वार्ता शनिवार को होने वाली है तो दोनों तरफ से ऐसे-ऐसे बयान आ रहे हैं जैसे ये शांति वार्ता नहीं बल्कि युद्ध के ऐलान का अवसर हो. अमेरिका और ईरान एक-दूसरे के खून के प्यासे हो रहे हैं. वो भी तब जब दोनों तरफ से प्रतिनिधिमंडल बातचीत के लिए पहुंच रहा है.

वेंस के जाते ही ट्रंप की धमकी

“हम एक रीसेट (तालमेल) कर रहे हैं. हम जहाजों को अब तक के सबसे बेहतरीन गोला-बारूद और हथियारों से लोड कर रहे हैं—उनसे भी बेहतर जो हमने पहले इस्तेमाल किए थे और उन्हें तहस-नहस कर दिया था. अगर हमारा समझौता नहीं होता है, तो हम उनका इस्तेमाल करेंगे, और हम उनका बहुत प्रभावी ढंग से इस्तेमाल करेंगे. ईरानियों को शायद यह अहसास नहीं है कि उनके पास अंतरराष्ट्रीय जलमार्गों का इस्तेमाल करके दुनिया से थोड़े समय के लिए जबरदस्ती वसूली करने के अलावा कोई और दांव नहीं है. आज वे सिर्फ इसलिए जिंदा हैं ताकि बातचीत कर सकें. आप ऐसे लोगों से निपट रहे हैं जिनके बारे में हमें नहीं पता कि वे सच बोलते हैं या नहीं. हमारे सामने वे कहते हैं कि वे सभी परमाणु हथियार खत्म कर रहे हैं, सब कुछ खत्म हो गया है. और फिर वे प्रेस के पास जाकर कहते हैं, ‘नहीं, हम संवर्धन करना चाहेंगे.’ तो हमें जल्द पता चल जाएगा.”

ट्रंप की धमकी पर ईरानी सेना का जवाब

“हम घोषणा करते हैं कि ईरान के सशस्त्र बल पूरी तरह से तैयार हैं और बंदूक की नोक पर हाथ रखे हुए हैं, ठीक उसी तरह जैसे थोपे गए युद्ध और 43 दिनों के असमान संघर्ष के दौरान थे.अमेरिका के अपराधी नेताओं, बच्चों की हत्या करने वाली जायोनी सत्ता और उनके पराजित कमांडरों और सैन्य कर्मियों को विजयी, शक्तिशाली और वीर ईरानी जनता और अजेय इस्लामी प्रतिरोध मोर्चे को धमकाने का कोई अधिकार नहीं है. ट्रंप और नेतन्याहू के लिए बेहतर यही होगा कि वे 40 दिनों तक चले थोपे गए युद्ध में अपनी और अपनी सेनाओं की अपमानजनक पराजय को याद करें, जिसमें आत्म-बलिदान करने वाले लड़ाकों द्वारा किए गए शक्तिशाली हमलों और अप्रत्याशित अभियानों के बावजूद उन्हें हार का सामना करना पड़ा था, और ईरानी जनता या दृढ़ प्रतिरोध बलों को धमकाना उचित नहीं है.”

दोनों तरफ की धमकियों को देखने के बाद ये कहना मुश्किल नहीं कि शनिवार सुबह जब वार्ता शुरू होगी तो दोनों पक्षों में से कोई भी झुकने के मूड में नहीं है. दोनों पक्ष खुद को युद्ध का विजेता मानकर शांति वार्ता की टेबल पर पहुंच रहे हैं. अमेरिका को लगता है कि उसने ईरान को बारूद-बारूद कर दिया. वहीं ईरान को लगता है कि अमेरिका की पूरी कोशिश के बावजूद ईरान में सत्ता परिवर्तन की उसकी सोच कामयाब नहीं हो पाई. अमेरिका को लगता है कि ईरान का उसने काफी नुकसान कर दिया है. वहीं ईरान को लगता है कि उसने अमेरिका को आर्थिक रूप से तगड़ा नुकसान कर दिया है. यही कारण है कि ऐसे बयान ठीक शांति वार्ता से पहले भी आ रहे हैं. जाहिर है शांति वार्ता में दोनों पक्ष तब तक नहीं मानेंगे जब तक दोनों को विजेता दिखने की कोई डील नहीं मिल जाती. पाकिस्तान की चुनौती यहीं से शुरू होती है.

 

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