संपादकीय

दों का एवं वेदोक्त धर्म ही मनुष्य मात्र का कर्तव्य है

सृष्टि रचना के समय ब्रह्मदेव ने मनुष्यों के लिए धर्मदि व्यवस्था, का वर्णन किया प्रतिपादन किया वेदों का एवं वेदोक्त धर्म ,ही, मनुष्य मात्र का कर्तव्य है। वेद मे धर्मदि, साधन हेतु काल तंत्र, समय का कथन किया गया, और उस, समय ज्ञान हेतु उन्हीँ ब्रह्मदेव ने, वेदांग रूप, ज्योतिष कालशास्त्र का, निर्माण किया,।
यह ज्योतिर्विज्ञान, सिद्धांत संहिता होरा नामक, तीन स्कंधों में विस्तृत वर्णित है, परंतु काल ज्ञान, सिद्धांत संभाग से समुत्पन्न होता है।
ज्योतिष शास्त्र अनुसार ही पांच अंगों को पंचांग कहते हैं।
तिथिवार्रश्च,नक्षत्रँ,योगः,करणमेव,च।
एतैःपँचभिरँगै, संयुक्तँ, पंचांग्डमुच्यते।
एवमेव, प्रकारान्तरेsपि,सूत्रम्,
तिथिर्वासरनत्रक्षे,योगः
करणमेव,च,इति, पंचांग्डमाख्यातँ, व्रतपर्व
निदर्शकम्,।।
तिथि वार नक्षत्र, योग करण,,ये, पांच विभाग,है।
प्रथम भाग तिथि तत्व,
सूर्यचंद्रयोर्या,स्थितिःसा,एव,तिथिः, अमावस्या के अंत पर सूर्य चंद्र दोनों एक समान राशि अंश पर रहते हैं, तथा शीघ्र गतिमान चंद्रमा का जब सूर्य से क्रमिक 12 अंशो,का, अंतर सिद्ध होता है उस कालाँश,अन्तराँश,को, प्रतिपदा 12 से 24 अँशान्तर,को, द्वितीया, एवमेव, क्रमशः 24 से 36 अशांन्तर, के होने पर तृतीया तिथि इसी प्रकार 12,12 अंश पर, तिथि क्रम वृद्धिशील, रहते 168 से 180 अंशान्तर, पर पूर्णिमा का स्वरूप प्रत्यक्ष प्रतीत होता है तथा 180 अंश के अंत से 168 अंश तक 12 अंश न्यूनान्तर, होने पर कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा 168 अंश से 156 अंक तक 12 अंश अल्प होते ही कृष्ण पक्ष की द्वितीया तिथि इसी प्रकार,न्यूनान्तर, होते होते 12 अंश से 0शून्य ,
अँशान्तर, पर 30,अमावस्या, तिथि का स्वरूप बनता है।
द्वितीय भाग,वारोँ,का, विज्ञान एक सूर्योदय से दूसरे सूर्योदय तक के पूर्वसमय को वार माना जाता है।
तृतीय भाग नक्षत्र, नक्षत्रनिर्णय, आकाश 360 अंशोँ का, गणनागत मान्य है तथा समस्त,भचक्र को, 27 भागों में विभक्त करने से 13 अंश, 20 कला अर्थात 800 कला का, एक क्षेत्र अश्विनी आदि से रेवती पर्यंत 27 नक्षत्र का भाग मान्य है।नक्षरतीति,नक्षात्राः,ये, नक्षत्र स्थित बिंदु मान के हैं। जिस दिन समय को चंद्रमा पृथ्वी से जिस नक्षत्र पुंज में दिखे उस, समय पंचांग में वही नक्षत्र रहता है।
चतुर्थ भाग योग, सूर्य चंद्र गति में 13, अंश 20 कला, का अंतर होने से एक योग का कालाँश बनता है, अर्थात सूर्य की माध्यमिक गति दैनिक 1 अंश है, और चंद्रमा कि 13 अंश 20 कलादि, जिस समय में दोनों मिलकर औसतन, 13 अंश, 20 कला की दूरी आकाश में पार करेंगे, उस कालाँश का, एक योग बनता है। योग 27 होते हैं।
पंचम भाग करण, तिथि के आधे भाग को कारण कहते हैं।तिथ्यर्ध,करणँ,स्यात, प्रत्येक भाग करण संज्ञा है, सूर्य चंद्रयोर्मध्ये,षट,अँशाँतरे,
करणमेकँ,।
अतः है तिथि के, आधे भाग को करण ,कहते हैं,तिथियोँ, के सूक्ष्म प्रभाव जानने के लिए प्रत्येक तिथि के दो भाग मान्य किये,है।
करण 11 प्रकार के होते हैं।
सात करण, चलसँज्ञक, एवं चार करण स्थिर, संज्ञक है।
पंडित गंगा प्रसाद आचार्य
धर्माधिकारी, अखिल भारतवर्षीय धर्म संघ शाखा मध्य प्रदेश।

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