ईरान के सरकारी समाचार एजेंसी मेहर को दिए एक साक्षात्कार में विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची ने कहा कि अमेरिका की धमकियां उन्हें डराने वाली नहीं हैं। उन्होंने यह भी बताया कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के विशेष दूत स्टीव विटकॉफ के साथ बातचीत के दौरान माहौल कितना तनावपूर्ण था।
अराघची ने बातचीत के दौरान का एक वाकया याद करते हुए कहा कि उन्होंने विटकॉफ से ऐसी बात कही थी, जिससे वहां मौजूद सभी लोग कुछ देर के लिए स्तब्ध रह गए। हालांकि, उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया कि यह बातचीत किस दौर या किस स्थान की थी। उन्होंने कहा, “मैंने विटकॉफ से पूछा, ‘क्या आप कभी ऐसी बैठक में रहे हैं, जहां आपको लगा हो कि किसी भी पल वहां धमाका हो सकता है?’ मेरी बात सुनकर वहां मौजूद सभी लोग स्तब्ध होकर मुझे देखने लगे।”किसी भी पल बमबारी में मारे जा सकते हैं’
अराघची ने कहा कि उन्होंने विटकॉफ से यह भी पूछा, “क्या आपने कभी फोन पर बात करते समय यह महसूस किया है कि किसी भी पल आप बमबारी में मारे जा सकते हैं, गायब हो सकते हैं और अपने परिवार से बात करते हुए यह सोचा हो कि शायद यह हमारी आखिरी बातचीत हो?उन्होंने कहा कि अमेरिका उन्हें न तो धमका सकता है और न ही किसी दबाव में ला सकता है, क्योंकि ईरान पहले भी ऐसे हालात का सामना कर चुका है और मजबूती से खड़ा रहा है। अराघची ने कहा, “यह वेनेजुएला जैसी जगह नहीं है, जहां किसी एक व्यक्ति को हटाने पर बाकी लोग डर जाएं और पीछे हट जाएं।”
ईरान ने अमेरिकी मांगों के सामने झुकने से किया मना
अराघची ने कहा कि 12 दिन तक चले युद्ध से पहले बातचीत के दौरान ईरान ने अमेरिका की मांगों के आगे झुकने से इनकार कर दिया था। इसके बाद अमेरिका ने कठिन रास्ता चुना। उन्होंने कहा, “अमेरिका ने कठिन रास्ता चुना और 12 दिन के युद्ध में उन्हें हार का सामना करना पड़ा। मेरी राय में, 12 दिन के युद्ध के बाद उन्होंने एक और गलत आकलन किया।”
अमेरिका को क्यों खत्म करना पड़ा संघर्ष?
उन्होंने कहा कि अमेरिका ने ईरान के प्रतिरोध का सही आकलन नहीं किया था। बाद में उसने अपने हथियारों और सैन्य संसाधनों को बढ़ाया, लेकिन आखिरकार उसे युद्ध समाप्त करना पड़ा। अराघची ने कहा, “यहूदी शासन को लगा था कि कुछ दिनों के हमलों से वह सब कुछ तबाह कर देगा, व्यवस्था बिखर जाएगी, शायद शासन भी गिर जाएगा और इस्लामी गणराज्य आत्मसमर्पण कर देगा।”
उन्होंने कहा, “जब ऐसा नहीं हुआ और वे लंबे समय तक युद्ध के लिए तैयार नहीं थे। उन्होंने देखा कि लोगों ने शासन का साथ छोड़ने के बजाय उसका समर्थन किया और उसके पीछे खड़े रहे। इसके बाद उन्हें युद्ध समाप्त करना पड़ा।”