रेजिडेंशियल कमर्शियल विवाद:
अब ‘हादसे’ भी हैरान हैं ‘गुजर कर’ मुझसे, मैं ‘उजड़ने’ के बाद भी ‘बसा हुआ’ लगता हूँ। भोपालऔद्योगिक_त्रासदी42साल भोपाल_विकास_योजना_त्रासदी #21साल
इस संकट का पूरा दायित्व केवल दुकान संचालकों पर डालना न्यायसंगत नहीं होगा। 1984 के भूमि विकास नियमों पर आधारित भोपाल विकास योजना 1995-2005 आज भी शहर के नियमन का आधार बनी हुई है। इस बीच जीवनशैली, शहर की आबादी, सीमाएं, सड़कें, अर्थव्यवस्था और नागरिक आवश्यकताएं पूरी तरह बदल चुकी हैं। बेरोज़गारी के कारण अनेक आवासीय मार्ग व्यावहारिक रूप से मिश्रित उपयोग वाले क्षेत्र बन गए, जबकि शासन के अलग-अलग विभागों ने कई प्रतिष्ठानों को व्यापार लाइसेंस, व्यावसायिक संपत्ति कर निर्धारण, बिजली कनेक्शन अथवा अन्य पंजीयन दिए। ये अनुमतियां अपने आप भू-उपयोग को वैध नहीं बनातीं, लेकिन इनके कारण नागरिकों में वैधता का विश्वास अवश्य पैदा हुआ। अतः जवाबदेही केवल व्यापारी की नहीं, उन संस्थाओं की भी तय होनी चाहिए जिन्होंने वर्षों तक इस विरोधाभास को बढ़ने दिया।
मास्टर प्लान का लंबित रहना इस संकट की प्रमुख जड़ है, हालाँकि इसे प्रत्येक अनधिकृत उपयोग का स्वतः वैधीकरण भी नहीं माना जा सकता। रोजमर्रा की ज़रूरतों, किराना, क्लिनिक और छोटे कार्यालय जैसी कम प्रभाव वाली सेवाओं को होटल, मैरिज गार्डन, गोदाम, मेगा शोरूम अथवा अत्यधिक यातायात उत्पन्न करने वाले प्रतिष्ठानों के समान मानना वैज्ञानिक नगर नियोजन नहीं है।
समाधान के लिए सरकार को भूखंडवार जीआईएस सर्वे कर स्वीकृत भू-उपयोग, भवन अनुमति, वास्तविक उपयोग, सड़क की चौड़ाई, पार्किंग, फ़ायर सेफ्टी और इन्फ़्रास्ट्रक्चर क्षमता सार्वजनिक करनी चाहिए। पात्र मुख्य मार्गों पर नागरिक परामर्श के बाद पारदर्शी वैधानिक प्रक्रिया से मिश्रित भू-उपयोग निर्धारित किया जा सकता है। समाधान पूरे शहर में समान मानदंडों पर हो; चुनिंदा और प्रतीकात्मक सीलिंग से समाधान नहीं निकलेगा।
आगे सरकार की पैरवी प्रमाणित आंकड़ों, विभागीय जवाबदेही और स्पष्ट वैधानिक रोडमैप पर आधारित होनी चाहिए। महानगरीय क्षेत्र की प्रस्तावित योजना को आधार बनाकर भोपाल का नया मास्टर प्लान और अधिक लंबित नहीं किया जाना चाहिए। अच्छी नगर योजना आजीविका और रहवासियों के अधिकारों में से किसी एक को नहीं चुनती, वह दोनों की रक्षा करती है।
— मनोज सिंह मीक
शहरी विकास के शोधार्थी


