
शिक्षा और रोजगार में आरक्षण को लेकर देश में समय-समय पर बहस होती रही है। इसी बीच राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि आरक्षण सामाजिक भेदभाव को दूर करने के लिए दिया गया है और जब तक समाज में भेदभाव रहेगा, तब तक इसकी आवश्यकता बनी रहेगी। मुंबई में एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने कहा कि डॉ. भीमराव आंबेडकर के विचारों का ईमानदारी से पालन किया जाए तो इस विषय पर कोई समस्या नहीं होगी।भागवत ने कहा कि जिन लोगों को आरक्षण का लाभ मिल चुका है और उनका उत्थान हो गया है, उन्हें इसका लाभ जरूरतमंद अन्य लोगों तक पहुंचाने की सोच रखनी चाहिए। उन्होंने कहा कि कुछ राज्यों में वर्गीकरण की मांग उठी है और इस पर सुप्रीम कोर्ट भी टिप्पणी कर चुका है। उन्होंने आरक्षण पर राजनीति से बचने और इसे सामाजिक एकता का माध्यम बनाने पर जोर दिया।
मोहन भागवत ने बताई सच्चे नेता की पहचान क्या?
भागवत ने आगे कहा कि सच्चा नेतृत्व केवल भाषण देने, चुनाव जीतने या लोगों को उपदेश देने तक सीमित नहीं होता। उन्होंने कहा कि वास्तविक नेता वह होता है जो पीछे रहकर काम करता है, दूसरों को आगे बढ़ाता है और सफलता तथा सम्मान सभी के साथ साझा करता है। मुंबई में जेन जी और अल्फा के छात्रों के साथ संवाद कार्यक्रम में उन्होंने नेतृत्व की इसी सोच को विस्तार से समझाया।मोहन भागवत ने कहा कि नेतृत्व का उद्देश्य केवल लोगों का नेतृत्व करना नहीं, बल्कि नए नेताओं को तैयार करना होना चाहिए। उन्होंने कहा कि वह स्वयं को नेता नहीं, बल्कि एक कार्यकर्ता मानते हैं। उनके अनुसार, नेतृत्व का मतलब लोगों को सही दिशा और प्रकाश की ओर ले जाना है। उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति केवल सामने आकर भाषण देता है या चुनाव जीतता है, वही नेता हो, ऐसा जरूरी नहीं है।
सच्चे नेता की पहचान क्या बताई?
भागवत ने एक संस्कृत श्लोक का उल्लेख करते हुए कहा कि सच्चे नेता के पास ज्ञान होना चाहिए और उसे दूसरों के गुणों की सराहना करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि एक अच्छा नेता सफलता, सम्मान और उपलब्धियों का श्रेय अकेले नहीं लेता, बल्कि उसे सभी के साथ बांटता है। उन्होंने यह भी कहा कि जब संघर्ष का समय आए तो नेता को योद्धा की तरह दृढ़ता से खड़ा होना चाहिए।
नेतृत्व का असली उद्देश्य क्या होना चाहिए?
आरएसएस प्रमुख ने कहा कि नेतृत्व का उद्देश्य खुद हमेशा आगे रहना नहीं, बल्कि ऐसे लोगों को तैयार करना है जो भविष्य में समाज का नेतृत्व कर सकें। उन्होंने कहा, “मैं स्वयं को नेता नहीं मानता। मैं अपने आपको एक कार्यकर्ता मानता हूं।” उनके अनुसार, यदि किसी व्यक्ति का नेतृत्व दूसरों को नेतृत्व करने योग्य बना देता है, तभी वह वास्तविक नेतृत्व कहलाता है।
युवाओं को क्या संदेश दिया?
जेनरेशन जेड और अल्फा के छात्रों से बातचीत के दौरान भागवत ने कहा कि समाज और देश के लिए काम करने की भावना सबसे महत्वपूर्ण है। उन्होंने युवाओं से कहा कि नेतृत्व को पद, प्रसिद्धि या व्यक्तिगत सफलता से नहीं जोड़ना चाहिए। उनके अनुसार, जो व्यक्ति समाज के लिए निस्वार्थ भाव से काम करता है और दूसरों को आगे बढ़ने का अवसर देता है, वही सच्चा नेता कहलाने का अधिकारी होता है।
LGBTQIA+ समाज के विवाह वाले मुद्दे पर क्या बोले भागवत?
- मोहन भागवत ने कहा कि एलजीबीटीक्यूआईए+ समुदाय समाज का अभिन्न हिस्सा है और भारतीय समाज में उन्हें स्वीकार करने की परंपरा रही है। मुंबई में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान समलैंगिक विवाह पर पूछे गए सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि समाज को पहले बदलाव के लिए तैयार होना चाहिए, क्योंकि कानून समाज को नहीं चलाता, बल्कि समाज ही कानून की दिशा तय करता है।
- भागवत ने कहा कि भारतीय परंपरा में विवाह केवल दो लोगों के साथ रहने की व्यवस्था नहीं है, बल्कि यह परिवार बनाने की एक संस्था है। उनके अनुसार, परिवार समाज की मूल इकाई है, जहां अगली पीढ़ी का निर्माण और संस्कार होते हैं। उन्होंने कहा कि मौजूदा समय में विवाह संस्था में बदलाव करने से अनचाहे दुष्प्रभाव हो सकते हैं, इसलिए इस विषय पर सावधानी से आगे बढ़ने की जरूरत है।
- हालांकि, आरएसएस प्रमुख ने यह भी कहा कि समलैंगिक जोड़ों के साथ रहने के लिए अलग कानूनी व्यवस्था पर विचार किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि इसे समलैंगिक विवाह कहने के बजाय ऐसा तंत्र विकसित किया जा सकता है, जिससे ऐसे साथी साथ रह सकें और समाज भी उसे स्वीकार करे। उनके अनुसार, समाज को मौजूदा सामाजिक संस्थाओं को बनाए रखते हुए एलजीबीटीक्यूआईए+ समुदाय को समायोजित करने का रास्ता विकसित करना चाहिए।



