अध्यात्मखबर

कौन हैं स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद?: पहले इन विवादों में रह चुके हैं शंकराचार्य, अब पॉक्सो के मामले में घिरे

यह पहली बार नहीं है, जब स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को लेकर विवाद खड़ा हुआ हो। चाहे राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम से दूर रहने की बात हो, राहुल गांधी के बचाव और निंदा से जुड़ा बयान हो या अखिलेश यादव के माफी मांगने की घटना हो या यूपी सीएम योगी आदित्यनाथ से वाद-विवाद की। उत्तराखंड के ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती बीते कई दिनों से सुर्खियों में बने हुए हैं। इस बीच अविमुक्तेश्वरानंद और उनके शिष्य के खिलाफ इलाहाबाद जिला न्यायालय की विशेष पॉक्सो अदालत ने बच्चों के यौन शोषण के मामले में एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया है। बताया गया है कि यह मुकदमा आशुतोष ब्रह्मचारी की अर्जी पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने दिया है।

हालांकि, यह पहली बार नहीं है, जब स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को लेकर विवाद खड़ा हुआ हो। चाहे राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम से दूर रहने की बात हो, राहुल गांधी के बचाव और निंदा से जुड़ा बयान हो या अखिलेश यादव के माफी मांगने की घटना हो या यूपी सीएम योगी आदित्यनाथ से वाद-विवाद की। आइये जानते हैं स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद कौन हैं और उनका नाम कब-कब चर्चा में आया जानें- कैसा रहा शुरुआती जीवन?

उमाशंकर पांडेय ने कक्षा छह तक की पढ़ाई प्रतापगढ़ में अपने गांव से ही की। इसके बाद उनके पिता ने तीक्ष्ण बुद्धि को देखते हुए उन्हें पढ़ाई के लिए बाहर भेजने का निर्णय लिया। इस बीच उनका गुजरात जाना हुआ। यहां उनका संपर्क गुजरात स्थित काशी मंदिर में रहने वाले राम चैतन्य से हुआ। कई बार उनके साथ बैठकर पं रामसुमेर सत्संग किया करते। वह एक बार उमाशंकर को भी लेकर मंदिर पहुंचे। कई दिनों तक वह वहां रहे। फिर बेटे उमाशंकर को रामचैतन्य के पास छोड़ दिया। यहीं रहकर उमाशंकर पूजन-पाठ और पढ़ाई करने लगे।रामचैतन्य स्वामी करपात्री जी महाराज के शिष्य थे। उन्हें धर्म और राजनीति दोनों में ही खासी दिलचस्पी थी। रामचैतन्य ने ही उमाशंकर को संस्कृति की पढ़ाई के लिए प्रेरित किया और इसके बाद वे काशी में संपूर्णानंद संस्कृति महाविद्यालय शिक्षा ग्रहण करने आ गए। यहां उन्होंने संस्कृत व्याकरण, उपनिषद, आयुर्वेद और धार्मिक ग्रंथों की गहराई से शिक्षा ली। बाद में उन्होंने विश्वविद्यालय से शास्त्री और आचार्य की डिग्री हासिल की।इस दौरान उमाशंकर पांडेय के राजनीति से जुड़ने की भी बातें सामने आती हैं। कहा जाता है कि पढ़ाई के दौरान वह अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) के संपर्क में आए। 1990 के बाद के वर्षों में वे छात्र राजनीति में बहुत सक्रिय थे।  काशी में ही उमाशंकर की भेंट स्वामी स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती से हुई। वर्ष 2000 में उन्होंने स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती से दीक्षा ली और उनके शिष्य बन गए। फिर उमाशंकर पांडेय से वह स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद हो गए।

पीएम मोदी की कभी की आलोचना, कभी रहे प्रशंसक

एक समय अविमुक्तेश्वरानंद, नरेंद्र मोदी के भी कट्टर समर्थक रहे। उन्होंने 2014 में प्रधानमंत्री पद के लिए नरेंद्र मोदी की उम्मीदवारी का खुलकर समर्थन किया। हालांकि, उनके सहयोगियों का कहना है कि बाद के वर्षों में, विशेष रूप से गोरक्षा के मुद्दे पर मोदी सरकार की ओर से ठोस कदम न उठाए जाने और बीफ के निर्यात में कथित बढ़ोतरी के कारण वे सरकार की आलोचना भी करते रहे।

योगी सरकार से भी हुआ है आमना-सामना

लांकि, जब एक मौके पर उनसे पीएम मोदी की नीतियों को लेकर सवाल किया गया तो उन्होंने कहा, “हम एंटी मोदी नहीं हैं। हम तो मोदी के प्रशंसक हैं। यह सच है और हमने कई बार सार्वजनिक रूप से यह बात कही है कि हम मोदी विरोधी नहीं हैं। हम इसलिए प्रशंसक हैं कि इससे पहले कौन सा प्रधानमंत्री हिंदुओं के साथ इतनी दृढ़ता के साथ खड़ा था। इतने प्रधानमंत्री रहे देश में, कौन साथ खड़ा रहा। हम किसी और प्रधानमंत्री की आलोचना नहीं करना चाहते, सबकी अपनी-अपनी विशेषताएं हैं।”

शंकराचार्य बनने की क्या है कहानी, क्यों छिड़ा था विवाद?

1. कैसे बने शंकराचार्य?
दीक्षा लेने के बाद से ही स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद उत्तराखंड स्थित ज्योतिर्मठ की सभी धार्मिक और प्रशासनिक गतिविधियों की देखरेख करते रहे। वे स्वामी स्वरूपानंद के सबसे प्रमुख शिष्यों में से एक माने जाते थे। सितंबर 2022 में स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के निधन के बाद, उनके निजी सचिव ने घोषणा की कि दिवंगत शंकराचार्य ने अपने जीवनकाल में ही अविमुक्तेश्वरानंद को ज्योतिष्पीठ के लिए अपना उत्तराधिकारी नामित किया था। इसके बाद 12 सितंबर 2022 को उन्हें ज्योतिष्पीठ का 46वां शंकराचार्य बनाया गया।

2. क्यों सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा शंकराचार्य बनने का विवाद?
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की शंकराचार्य के तौर पर नियुक्ति को लेकर विवाद भी रहा है। अक्तूबर 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने उनकी ताजपोशी पर रोक लगा दी थी। अदालत में दायर याचिकाओं में आरोप लगाया गया था कि उनकी नियुक्ति को पुरी के गोवर्धन मठ के शंकराचार्य स्वामी निश्छलानंद सहित अन्य शंकराचार्यों की जरूरी सहमति नहीं थी। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से जवाब मांगा और मामले पर सुनवाई की। इस मामले में दायर याचिका में कहा गया था कि अविमुक्तेश्वरानंद ने खुद को शंकराचार्य के उत्तराधिकारी नामित किए जाने से जुड़े झूठे दावे किए। इस मामले की सुनवाई तब जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस बीवी नागरत्ना की बेंच ने की थी।

मौजूदा समय में भी उनकी पदवी को लेकर कानूनी और प्रशासनिक चुनौतियां जारी हैं। हालांकि, स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का तर्क है कि शंकराचार्य कौन होगा, यह निर्णय लेने का अधिकार न तो प्रशासन को है, न मुख्यमंत्री को और न ही राष्ट्रपति को; यह केवल शंकराचार्यों द्वारा ही तय किया जा सकता है। उनके समर्थकों का दावा है कि वे अपने गुरु के मुख्य शिष्य थे और पीठ को शंकराचार्य के बिना नहीं छोड़ा जा सकता था। अविमुक्तेश्वरानंद ने यह भी दावा किया कि दो शंकराचार्यों ने उन्हें शंकराचार्य माना है, जबकि पुरी के शंकराचार्य ने उनकी नियुक्ति को मौन सहमति दी है।

राजनीतिक आलोचनाओं के लिए भी बने हैं निशाना

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने पिछले कुछ वर्षों में भाजपा की केंद्र और राज्य सरकारों के अलग-अलग निर्णयों और नीतियों का मुखर विरोध किया है। हालांकि, उनकी आलोचनाएं भाजपा तक ही सीमित नहीं रही हैं। अलग-अलग मौकों पर वे कांग्रेस, उसके नेता राहुल गांधी और अखिलेश यादव की भी आलोचना कर चुके हैं।

अखिलेश यादव के शासन में ऐसा क्या हुआ, जिसे लेकर सपा नेता ने बाद में माफी मांगी।

2015 का लाठीचार्ज और विवाद
उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के शासनकाल के दौरान सितंबर 2015 में वाराणसी में गंगा में प्रतिमा विसर्जन को लेकर विवाद हुआ था। दरअसल, 2015 में 22 सिंतबर को दिन में गणेश प्रतिमा विसर्जन रोके जाने के विरोध में वाराणसी के गोदौलिया चौराहे पर धरना दे रहे मराठा गणेशोत्सव सेवा समिति के कार्यकर्ताओं के समर्थन में दूसरे दिन जनता सड़क पर उतर आई थी। इस दौरान साधु-संतों के धरने पर बैठने से माहौल गरम हो गया।

गंगा में प्रतिमा विसर्जन की अनुमति के लिए दो संतों ने अन्न-जल का त्याग कर दिया। लेकिन देर रात पुलिस ने लाठीचार्ज कर लोगों को बुरी तरह पिटाई कर दी। लाठीचार्ज से वहां भगदड़ जैसी स्थिति बन गई, जिससे कई लोग गंभीर रूप से घायल हो गए। पुलिस ने लोगों और साधु-संतो पर लाठियां भांजीं। इसमें स्वमी अविमुक्तेश्वरानंद, बालक दास समेत 40 से अधिक संत-बटुक घायल हुए थे। उस समय इस घटना के लिए अखिलेश यादव की सरकार की काफी आलोचना हुई थी।

2021 में माफी मांगने पहुंचे थे अखिलेश

अप्रैल 2021 में, अखिलेश यादव ने हरिद्वार पहुंचकर शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती और स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद से मुलाकात की थी और 2015 की घटना के लिए माफी मांगी। उन्होंने संतों के सामने शरणागत होने की बात कही और उनका आशीर्वाद लिया। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने अखिलेश यादव की माफी को स्वीकार करते हुए कहा कि उन्होंने अखिलेश के मन में उस घटना के प्रति पछतावा देखा। उन्होंने अखिलेश को पुरानी बातें भूलकर नई ऊर्जा के साथ समाज सेवा में जुटने का आशीर्वाद दिया।

क्या है पॉक्सो से जुड़ा ताजा मामला?

प्रयागराज की एक विशेष पॉक्सो अदालत ने झूंसी थाना प्रभारी को स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया है। यह आदेश बटुकों (आश्रम में रहने वाले लड़कों) के यौन शोषण के आरोपों की जांच के लिए दिया गया है।

यह आवेदन आशुतोष ब्रह्मचारी महाराज और अन्य लोगों की ओर से दायर किया गया था। उन्होंने आरोप लगाया है कि वाराणसी स्थित विद्या मठ की पांचवीं मंजिल पर बच्चों का यौन शोषण किया जाता है और उनके पास इसके पर्याप्त सबूत हैं। याचिका में भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धाराओं 69, 74, 75, 76, 79, और 109 (जो यौन हमले से संबंधित हैं) के साथ-साथ पॉक्सो एक्ट की धारा 3, 5, 9 और 17 के तहत मामला दर्ज करने की मांग की गई है।

अदालत ने इस मामले में पीड़ित बटुकों के बयान दर्ज करने और सबूतों की जांच करने के बाद एफआईआर का आदेश जारी किया।

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने आरोपों पर क्या कहा?

शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने कहा, “मामला दर्ज होने पर ही जांच और गवाही की बाद की प्रक्रिया पूरी होगी। तभी हमारे खिलाफ दायर झूठे मामले की सच्चाई सबके सामने आएगी और इसके लिए जिम्मेदार लोगों को दंडित किया जा सकेगा। इसलिए यह जरूरी है। हम केवल यही कहेंगे कि अदालत बहुत अधिक समय लिए बिना इसे तेज गति से आगे बढ़ाए, क्योंकि बहुत से लोग इस मामले को देख रहे हैं।”

उन्होंने कहा, “गवाही दर्ज की जानी चाहिए और जल्द से जल्द निर्णय लिया जाना चाहिए। जो गलत है वह गलत ही रहेगा, और जो झूठा मामला दर्ज किया गया है वह अंततः झूठा ही साबित होगा।”

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