

नई दिल्ली: केंद्र सरकार भारतीय लोकतांत्रिक ढांचे में बड़े बदलाव की दिशा में आगे बढ़ती दिख रही है। संविधान (एक सौ इकतीसवां संशोधन) विधेयक, 2026 के जरिए लोकसभा और विधानसभाओं में सीटों के पुनर्समायोजन, निर्वाचन क्षेत्रों के नए परिसीमन और महिलाओं के लिए एक-तिहाई आरक्षण को जल्द लागू करने का रास्ता साफ करने की कोशिश की गई है। इसके तहत लोकसभा की सीटें 850 तक करने का प्रस्ताव है। इसके लिए लोकसभा में गुरुवार को बिल पेश होने वाला है।
प्रस्ताव में परिसीमन पर लगी पुरानी रोक हटाने का प्रावधान
यह प्रस्ताव सिर्फ सीटों की संख्या बढ़ाने तक सीमित नहीं है, बल्कि जनसंख्या की संवैधानिक परिभाषा बदलने, परिसीमन पर लगी पुरानी रोक हटाने और केंद्र शासित प्रदेशों की विधानसभाओं में भी नए ढांचे को लागू करने का व्यापक प्रयास है। सरकार के मुताबिक, 1971 की जनगणना के आधार पर लंबे समय से जमी हुई सीट व्यवस्था अब देश की मौजूदा जनसांख्यिकीय वास्तविकताओं को नहीं दर्शाती।
पिछले दशकों में शहरीकरण, आंतरिक माइग्रेशन, आबादी का असमान विस्तार और नए सामाजिक-राजनीतिक संतुलन ने प्रतिनिधित्व के सवाल को और अहम बना दिया है। ऐसे में यह विधेयक लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व को अधिक संतुलित और समावेशी बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। विधेयक का सबसे बड़ा और राजनीतिक रूप से सबसे असरदार प्रावधान लोकसभा की सदस्य संख्या में वृद्धि से जुड़ा है। संविधान के अनुच्छेद 81 में संशोधन का प्रस्ताव रखते हुए यह व्यवस्था की जा रही है कि राज्यों के क्षेत्रीय निर्वाचन क्षेत्रों से सीधे चुने जाने वाले सदस्यों की संख्या 815 से अधिक नहीं होगी। इसके अलावा केंद्र शासित प्रदेशों का प्रतिनिधित्व करने के लिए अधिकतम 35 सदस्य हो सकेंगे।
इस बदलाव का मतलब यह है कि भविष्य में लोकसभा की कुल क्षमता मौजूदा संख्या से काफी अधिक हो सकती है और वह 850 तक हो सकती है। सरकार का तर्क है कि लोकतंत्र में प्रतिनिधित्व का आधार जनसंख्या और क्षेत्रीय संतुलन होना चाहिए।
यदि किसी राज्य या क्षेत्र की आबादी में भारी वृद्धि हुई है, तो वहां के मतदाताओं को उसी अनुपात में प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए। यही वजह है कि लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाने का प्रस्ताव सिर्फ तकनीकी संशोधन नहीं, बल्कि राजनीतिक प्रतिनिधित्व के पुनर्गठन का संकेत माना जा रहा है। इस प्रस्ताव का असर राष्ट्रीय राजनीति पर भी पड़ेगा।


