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आधुनिक भारत में दहेज का ‘दानव’, हर दिन मर रहीं 16 महिलाएं

ट्विशा-दीपिका की मौत ने दिखाया आईना

भोपाल की ट्विशा और ग्रेटर नोएडा की दीपिका नागर में क्या समानता है? दोनों की मौत संदिग्ध परिस्थितियों में हुई है। दोनों के परिवारों का आरोप है कि उन्हें दहेज की मांग के चलते मार डाल गया। वे पढ़ी-लिखी, शहरी, आधुनिक पेशेवर होने के बावजूद दहेज उत्पीड़न और घरेलू हिंसा से बच नहीं पाई। इसी साल जनवरी में दिल्ली पुलिस की SWAT कमांडो और चार माह से गर्भवती काजल चौधरी की उनके पति अंकुर ने डंबल से पीट-पीटकर हत्या कर दी थी। हैरानी की बात है कि आधुनिक भारत में भी दहेज प्रथा बड़ी समस्या बनी हुई है। इन महिलाओं की मौत इस तथ्य की ओर भी इशारा करती है कि दहेज लेने-देने की समस्या समाज के हर वर्ग में फैली हुई है।

दहेज को स्वीकार्यता: इस सिलसिले में नैशनल क्राइम रेकॉर्ड्स ब्यूरो (NCRB) की हालिया रिपोर्ट भी चौंकाती है। रिपोर्ट में बताया गया है कि 2024 में दहेज हिंसा के चलते हर दिन औसतन 16 महिलाओं की मौत हुई। दहेज हत्या के मामलों में दिल्ली लगातार पांचवें वर्ष भी महानगरों में सबसे आगे रही। वहीं, दहेज उत्पीड़न के सर्वाधिक मामले उत्तर प्रदेश में दर्ज हुए। इसके बाद बिहार और कर्नाटक का स्थान रहा। इसकी वजह यह है कि दहेज केवल रुपये-पैसे के लेन-देन का मामला नहीं है बल्कि यह सामाजिक प्रतिष्ठा, पितृसत्तात्मक व्यवस्था और महिलाओं पर संपूर्ण नियंत्रण से भी जुड़ा हुआ है।

समस्या की जड़: दहेज संभवतः इकलौता ऐसा ‘अपराध’ है जिसे समाज के हर तबके में अपनी हैसियत के अनुसार अंजाम देने की सामाजिक परंपरा रही है। दहेज भारतीय समाज की संभवतः इकलौती ऐसी समस्या है, जिसमें दहेज देने और लेने वाले (दोनों पक्षों) को कानूनी रूप से दोषी माना जाता है और दंड का प्रावधान होता है। बावजूद इसके, जागरूकता बढ़ने के साथ-साथ यह खत्म नहीं हुई बल्कि और अधिक हैरतअंगेज रूप में सामने आने लगी। दहेज को गिफ्ट, शगुन या स्टेटस कहने वाले समाज में इसे तब तक लोग निन्दा की दृष्टि से नहीं देखते जब तक कि इसमें हिंसा, हत्या आदि न शामिल हो।

सुधार कहां जरूरी: शादी बचाने का दबाव और परिवार की इज्जत के कारण कई महिलाएं समय रहते शिकायत नहीं कर पातीं। कानून मौजूद होने के बावजूद रोकथाम, शिकायत तंत्र और सामाजिक समर्थन भी पर्याप्त और प्रभावी नहीं है। अगर आज भी यह समस्या अपने घिनौने परिणामों के साथ सामने आती है तो इसलिए क्योंकि कानून बन जाने भर से समाज तुरंत नहीं बदलता। जब तक स्त्री, पुरुष और विवाह को लेकर सामाजिक सोच नहीं बदलेगी, पारिवारिक संरचना की री-कंडिशनिंग और महिलाओं की आर्थिक स्वतंत्रता के ईर्द-गिर्द आमूलचूल बदलाव नहीं होंगे, तब तक यह समस्या समाज के बीच कायम रहेगी और हम बेटियां खोते रहेंगे।

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