नरसी मेहता को शिव से मिला राधा-कृष्ण भक्ति का वरदान- दिपाली पसारी


दिपाली पसारी
लेखिका, दिपाली पसारी माहेश्वरी, सचिव माहेश्वरी महिला मंडल सांस्कृतिक प्रकोष्ठ
नरसिंह मेहता भगवान के अनन्य भक्त थे। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर शिवजी ने उनसे कहा कि जो भी मांगना है वह मांगो। तब नरसिंह मेहता ने कहा कि मुझे आपकी सबसे प्रिय वस्तु दे दीजिए। इतना सुनकर पार्वती घबरा गई। उन्हें लगा कि पत्नी से प्रिय वस्तु शिवजी को क्या है ही हो सकती है, परन्तु शिवजी ने कहा कि मैंने अपनी सूची में प्रथम स्थान श्रीकृष्ण और राधा की भक्ति को दिया है और पार्वती तुम्हें मैंने दूसरे नंबर पर रखा है, क्योंकि मुझे यह पता था कि कोई भी भक्त कभी भी मुझसे मेरी सबसे प्रिय वस्तु मांग सकता है । तब नरसिंह मेहता शिव जी से प्रार्थना करने लगे कि उन्हें राधा कृष्ण का दर्शन कराएं और उनकी भक्ति उन्हें दें। शिव जी ने प्रसन्न होकर उनकी बात मानी और इसी वरदान के फलस्वरूप, चूंकि नरसिंह मेहता एक गरीब ब्राह्मण थे और जब उनकी बेटी के यहां मायरे का प्रसंग हुआ और उनके पास मायरे में देने के लिए कुछ भी नहीं था तब श्री कृष्ण ने राधा रुक्मिणी और श्री लक्ष्मी जी सहित आकर उनकी बेटी के ससुराल में ऐसा मायरा किया जो आज तक संसार में किसी भी बेटी के यहाँ न हुआ हो। और इस प्रकार शिव जी ने अपना दिया हुआ वचन निभाया और श्री कृष्ण ने अपने भक्त की लाज बचा ली। इस कथा का मूल सार यह है कि अगर कोई भी भक्त सांवरिया के चरणों में तन मन, धन लगाकर निष्ठा और विश्वासपूर्वक भक्ति करता है।
तो सांवरिया, उनके सारे कार्य सार्थक करते हैं और अपने भक्त का हर परिस्थिति में साथ देते हैं।
नानी बाई का मायरा की कथा
भगवान अपने भक्तों का संकट दूर करने के लिए किसी न किसी रूप में पहुंच जाते हैं। प्रभु दयालु और त्रिकालदर्शी हैं, भक्त की एक पुकार पर सभी दुःखों को दूर करते हैं। नानी बाई का मायरा भगवान श्रीकृष्ण और और उनके भक्त नरसी मेहता पर आधारित है। गुजरात के जूनागढ़ के नरसी मेहता भगवान श्रीकृष्ण के अनन्य भक्त थे। नरसी जी पूरे समय द्वारकाधीश की भक्ति में लीन रहते थे। उनकी बेटी नानी बाई की शादी हो गई और परंपरा के अनुसार मायरा भरना था ।जिसमें ‘मायरो अर्थात ‘भात’ जोकि मामा या नाना द्वारा कन्या को उसकी शादी में दिया जाता है। वह भात स्वयं श्री कृष्ण लाते हैं। नानी बाई का विवाह जब तय हुआ था, तब नानी बाई के ससुराल वालों ने यह सोचा कि नरसी एक गरीब व्यक्ति है. वह शादी की रस्म भात नहीं भर पायेगा। उनको लगा कि अगर वह साधुओं की टोली को लेकर पहुँचे तो उनकी बहुत बदनामी हो जायेगी, इसलिये उन्होंने एक बहुत लम्बी सूची भात के सामान की बनाई। उस सूची में करोड़ों का सामान लिख दिया गया, जिससे कि नरसी उस सूची को देखकर खुद ही न आये। नरसी जी को निमंत्रण भेजा गया साथ ही मायरा भरने की सूची भी भेजी गई परन्तु नरसी के पास केवल एक चीज़ थी-श्री कृष्ण की भक्ति, इसलिये भगवान् श्रीकृष्ण पर भरोसा करते हुए अपने संतों की टोली के साथ बेटी को आशीर्वाद देने के लिये अंजार नगर पहुँच गये। उन्हें आता देख नानी बाई के ससुराल वाले भड़क गये और उनका अपमान करने लगे। इस अपमान से नरसी जी व्यथित हो, रोते हुए श्रीकृष्ण को याद करते हुए, वहां से चल दिए। नानी बाई भी अपने पिता के इस अपमान को बर्दाश्त नहीं कर पाई और आत्महत्या करने दौड़ पड़ी परन्तु श्री कृष्ण ने नानी बाई को रोक दिया और उससे कहा कि कल यह स्वयं नरसी के साथ मायरा भरने के लिये आयेंगे।दूसरे दिन नानी बाई बड़ी ही उत्सुकता के साथ श्री कृष्ण और नरसी जी का इंतज़ार करने लगी, तभी सामने देखती है कि नरसी जी संतों की टोली और कृष्ण जी एक सेठ का रूप धारण करके साथ चले आ रहे हैं और उनके पीछे ऊँटों और घोड़ों की लम्बी कतार आ रही है जिनमें सामान लदा हुआ है। दूर-दूर तक बैलगाड़ियों ही बैलगाड़ियों नज़र आ रही थी, जिनमें वह सब दुगना भरा था, जिसकी मांग पत्र में लिखी गई थी। ऐसा मायरा न अभी तक किसी ने देखा नहीं था। यह सब देखकर ससुराल वाले अपने किये पर पछताने लगे। कहते हैं भगवान् द्वारिकाधीश ने स्वर्ण मुद्राओं की ऐसी वर्षा की, जिससे गाँव वाले भी धनी हो गए। नानी बाई के ससुराल वाले उस सेठ को देखते ही रहे और सोचने लगे कि कौन है ये सेठ और ये क्यों नरसी जी की मदद कर रहा है. जब उनसे रहा न गया तो उन्होंने पूछा कि कृपा करके अपना परिचय दीजिये और आप क्यों नरसी जी की सहायता कर रहे हैं।उनके इस प्रश्न का जवाब सेठ ने दिया, वही इस कथा का सम्पूर्ण सार है। सेठजी का उत्तर था में नरसी जी का सेवक हूँ, इनका अधिकार चलता है. मुझ पर। जब कभी भी ये मुझे पुकारते हैं. में दौड़ा चला आता हूँ, इनके पास। जो ये चाहते हैं. मैं वही करता हूँ। इनके कहे कार्य को पूर्ण करना ही मेरा कर्तव्य है। ये उत्तर सुनकर सभी हैरान रह गये और किसी के समझ में कुछ नहीं आ रहा था, बस नानी बाई ही समझती थी कि उसके पिता की भक्ति के कारण ही श्री कृष्ण उनसे बंध गये हैं और उनका दुख अब देख नहीं पा रहे हैं इसलिये मायरा भरने के लिये स्वयं ही आ गये हैं। भगवान केवल अपने भक्तों के वश में होते हैं।



