ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान ने शनिवार को नई दिल्ली में 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान कहा कि ब्रिक्स का उद्देश्य अमेरिका की ओर से लगाए जाने वाले एकतरफा प्रतिबंधों का मुकाबला करना है। उन्होंने कहा कि अमेरिका अपनी इच्छा के अनुसार किसी भी देश पर प्रतिबंध लगा देता है। पेजेश्कियान के मुताबिक ब्रिक्स इसी तरह के दबदबे को तोड़ने के लिए बनाया गया है। उन्होंने कहा कि सदस्य देशों को ऐसा व्यापार और सहयोग विकसित करना चाहिए, जो किसी एक देश के फैसले या प्रतिबंध पर निर्भर न हो।
क्या ब्रिक्स अमेरिका के एकतरफा फैसलों को चुनौती देना चाहता है?
पेजेश्कियान ने कहा कि ब्रिक्स देशों को एक-दूसरे की मदद और समर्थन करना चाहिए, ताकि एकतरफावाद का मुकाबला किया जा सके। उनका कहना है कि सदस्य देशों के बीच व्यापार और आर्थिक संबंधों को इस तरह बढ़ाया जाना चाहिए कि किसी एक देश के प्रतिबंधों से पूरी व्यवस्था प्रभावित न हो। उन्होंने अमेरिका के एकतरफा रवैये को रोकने की जरूरत बताई और कहा कि ब्रिक्स का मकसद ऐसी व्यवस्था तैयार करना है, जिसमें देशों को व्यापार और आर्थिक सहयोग के लिए ज्यादा स्वतंत्रता मिले।
पश्चिम एशिया के संघर्ष पर ईरान ने अमेरिका पर क्या आरोप लगाया?
- नई दिल्ली में ब्रिक्स नेताओं की बैठक के दौरान पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव का मुद्दा भी सामने आया। शनिवार को अपनाए गए नई दिल्ली घोषणा पत्र में पश्चिम एशिया में बढ़ती हिंसा पर गंभीर चिंता जताई गई और अधिकतम संयम बरतने तथा विवादों के समाधान के लिए बहुपक्षीय रास्ता अपनाने की बात कही गई।
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- इसी बीच पेजेश्कियान ने ईरान पर युद्ध शुरू करने के आरोप को खारिज किया। उन्होंने कहा कि युद्ध ईरान ने शुरू नहीं किया, बल्कि अमेरिका ने हमला शुरू किया। उन्होंने दावा किया कि ईरान के राजनीतिक और सैन्य नेताओं, वैज्ञानिकों, छात्रों और बुनियादी ढांचे को निशाना बनाया गया। पेजेश्कियान ने ईरान की बाद की सैन्य कार्रवाई को आत्मरक्षा बताया।
भारत और ईरान के बीच चाबहार को लेकर क्या बातचीत हुई?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पेजेश्कियान की ब्रिक्स सम्मेलन से इतर मुलाकात में पश्चिम एशिया की स्थिति के साथ व्यापार और क्षेत्रीय संपर्क पर भी चर्चा हुई। मोदी ने कहा कि पश्चिम एशिया के विवादों का समाधान बातचीत और कूटनीति से होना चाहिए। उन्होंने समुद्री रास्तों और व्यापार की स्वतंत्रता तथा नाविकों की सुरक्षा के महत्व पर भी जोर दिया। वहीं पेजेश्कियान ने चाबहार बंदरगाह को भारत और ईरान के बीच सहयोग का अहम केंद्र बताया। उन्होंने कहा कि ईरान भौगोलिक रूप से महत्वपूर्ण जगह पर है और उत्तर-दक्षिण तथा पूर्व-पश्चिम को जोड़ने वाले रास्ते के रूप में काम कर सकता है।
क्या चाबहार के जरिए भारत और ईरान का आर्थिक सहयोग बढ़ेगा?
पेजेश्कियान ने कहा कि ईरान ऐतिहासिक रूप से सिल्क रोड का अहम हिस्सा रहा है और अब पुराने संपर्क मार्गों को फिर से मजबूत किया जा सकता है। भारत ने चाबहार को मध्य एशिया तक पहुंच के महत्वपूर्ण रास्ते के रूप में विकसित करने में निवेश किया है। जब पेजेश्कियान से पूछा गया कि प्रधानमंत्री मोदी के साथ बातचीत में चाबहार और भारतीय निवेश का मुद्दा उठा या नहीं, तो उन्होंने कहा कि दोनों देशों ने कई संभावनाओं पर चर्चा की। उन्होंने आगे कहा कि भारत वहां निवेश कर सकता है और मौजूदा निवेश भी जारी है। उनके मुताबिक सहयोग केवल बंदरगाह तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि इसमें व्यापार, साझेदारी और व्यापक आर्थिक संपर्क का नेटवर्क भी शामिल हो सकता है। पेजेश्कियान के रुख से साफ है कि ईरान ब्रिक्स के आर्थिक प्रभाव का इस्तेमाल पश्चिमी वित्तीय और व्यापारिक व्यवस्था पर निर्भरता कम करने के लिए करना चाहता है और भारत के साथ चाबहार के जरिए क्षेत्रीय संपर्क को भी आगे बढ़ाना चाहता है।
