अमिताभ बच्चन के स्टारडम को देते थे कड़ी टक्कर, फिर क्यों विनोद खन्ना ने करोड़ों की शोहरत छोड़ आश्रम में धोए बर्तन?

मुंबई के फिल्मी गलियारों में उस वक्त हलचल मच जाती है, जब करियर के शिखर पर पहुंचा एक एक्टर प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाकर रातोंरात गायब हो जाता है… अपने पीछे छोड़ जाता है भरा-पूरा परिवार, करोड़ों की दौलत, महंगी गाड़ियां और स्टारडम. यह किसी मसाला फिल्म की स्क्रिप्ट जरूर लगती है, लेकिन ऊपर वाले ने उस एक्टर के लिए जिंदगी की ऐसी ही स्क्रिप्ट तैयार कर रखी थी
70 और 80 के दशक में एक ऐसा दौर था, जब विनोद खन्ना का स्टारडम अपने चरम पर था. जब मुंबई के हर तीसरे सिनेमाघर के बाहर लगे कटआउट्स पर एक ही नाम चमक रहा था. गजब का हैंडसम लुक, चाल में एक अलग ही बेपरवाही और पर्दे पर ऐसी कड़क स्क्रीन प्रेजेंस कि अमिताभ बच्चन जैसे महानायक का ‘एंग्री यंग मैन’ अवतार भी उनके सामने फीका पड़ने लगता था. उस दौर में प्रोड्यूसर्स नोटों से भरे बैग लेकर उनके जुहू वाले बंगले के बाहर सिर्फ एक ‘हां’ के लिए दिन-रात पहरा देते थे.
लेकिन फिर 1982 में अचानक कुछ ऐसा हुआ, जिसने पूरे बी-टाउन के होश उड़ा दिए. जब पूरी इंडस्ट्री मान चुकी थी कि विनोद खन्ना अब अमिताभ से ‘नंबर-1’ का ताज छीनकर बॉलीवुड के नए बादशाह बनने वाले हैं, तभी उन्होंने यू-टर्न लेते हुए एक प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई और अपनी करोड़ों की गाड़ियां, आलीशान जिंदगी और परिवार को पीछे छोड़ गायब हो गए.
वह अमेरिका के जंगलों में ओशो के आश्रम चले गए और ‘स्वामी विनोद भारती’ बनकर 5 सालों तक रोज सुबह उठकर माली की तरह पौधों को सींचने लगे, बगीचे की घास काटने लगे और आश्रम के गंदे बर्तन धोने लगे.
आखिर ऐसा क्या दर्द या खालीपन था, जिसने चमकती दुनिया के सबसे बड़े सुपरस्टार को एक पल में ‘फकीर’ बना दिया? और जब 6 साल बाद वह लौटे, तो क्या बदले हुए बॉलीवुड ने उन्हें फिर से अपना पाया?
6 अक्टूबर को विनोद खन्ना की 80वीं बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर ‘अनसुनी दास्तान’ के इन 4 रोमांचक चैप्टर्स में पढ़िए एक विलेन से सुपरस्टार, ओशो के माली, राजनेता और फिर हमेशा के लिए अलविदा कह जाने वाले इस ‘संन्यासी सुपरस्टार’ की पूरी कहानी.
चैप्टर 1: पेशावर में जन्म, मुंबई में पढ़ाई और हीरो बनने आए तो मिला विलेन का रोल
विनोद खन्ना का जन्म 6 अक्टूबर 1946 को पेशावर अब पाकिस्तान के एक कारोबारी परिवार में हुआ था. बंटवारे के भयानक दौर के बाद उनका परिवार मुंबई आकर बस गया. लंबे कद और रोबीली पर्सनैलिटी की वजह से कॉलेज के दिनों से ही लड़कियां उनकी दीवानी थीं और उनका रुझान एक्टिंग की तरफ बढ़ा.
1968 में आई फिल्म ‘मन का मीत’ से उन्होंने बॉलीवुड में कदम रखा, लेकिन किस्मत का खेल देखिए- उन्हें हीरो नहीं, बल्कि एक खूंखार विलेन का रोल मिला.
- विलेन बनकर छाए: ‘पूरब और पश्चिम’ और ‘आन मिलो सजना’ जैसी फिल्मों में उन्होंने विलेन का रोल ऐसा निभाया कि दर्शक हीरो से ज्यादा विनोद खन्ना के एंट्री सीन पर सीटियां बजाते थे.




