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सारे विषय दिमाग से पढ़े जाते हैं, परंतु साहित्य पढ़ने के लिए दिल और दिमाग दोनों चाहिए- डॉ. प्रभु शंकर शुक्ल

प्रत्येक साहित्यकार का दायित्व है कि वह हिंदी के विकास हेतु सतत प्रयासरत रहते हुए अग्रदूत बने, तभी नई पीढ़ी का झुकाव हिंदी की ओर उन्मुख होगा- गोकुल सोनी


“देह की तू फिक्र न कर, जाएगी एक दिन बिखर।”
स्टेट बैंक साहित्य एवं कला परिषद की साहित्यिक गोष्ठी संपन्न

भोपाल। स्टेट बैंक साहित्य एवं कला परिषद की मासिक गोष्ठी का आयोजन संस्था अध्यक्ष श्री गोकुल सोनी के आवास पर हुआ। कार्यक्रम की अध्यक्षता हरदा से पधारे सेवानिवृत्त महाविद्यालय प्राचार्य डॉ प्रभुशंकर शुक्ल ने की। मुख्य अतिथि बिहार से पधारे साहित्यकार श्री संजय सरस एवं विशेष अतिथि नोएडा से पधारे सुप्रसिद्ध कवि श्री मधुकांत चतुर्वेदी रहे। कार्यक्रम का सफल एवं रोचक संचालन श्री जयंत भारद्वाज ने किया।
कार्यक्रम का शुभारंभ करते हुए संस्था अध्यक्ष श्री गोकुल सोनी ने अपने स्वागत भाषण में कहा कि प्रत्येक साहित्यकार का दायित्व है कि वह हिंदी के विकास हेतु सतत प्रयासरत रहते हुए अग्रदूत बने, तभी नई पीढ़ी का झुकाव हिंदी की ओर उन्मुख होगा। कार्यक्रम के अध्यक्ष डॉ प्रभुशंकर शुक्ल ने अपने उद्बोधन में कहा कि सारे विषय दिमाग से पढ़े जाते हैं, परंतु साहित्य पढ़ने के लिए दिल और दिमाग दोनों चाहिए। मुख्य अतिथि श्री संजय सरस ने संस्था के साहित्यिक कार्यकलापों की भूरि भूरि प्रशंसा की एवं नोएडा से पधारे शशिकांत चतुर्वेदी ने कहा कि भोपाल शहर जैसा साहित्यिक वातावरण भारत के विरले शहरों में ही देखने को मिलता है।
कविता पाठ के अंतर्गत गोकुल सोनी ने पढ़ा, “रेत पर नाम लिखकर मिटाते हो क्यों, मन में मूरत बसी है क्या मिट पाएगी” गीतकार कैलाश मेश्राम ने पढ़ा “एक प्रणय की साधिका का, कौन सा विचलन लिखूं। रोता अंतर्मन लिखूं या मन को अब मधुबन लिखूं।” मनोज गुप्त मनोज ने पढ़ा, “कोमल निरीह बेचारा बालक, अपनी मर्यादा को ढांके। सिकुड़े तन और फटे दृगों से, औरों के दृगों में झांके।” प्रदीप श्रीवास्तव ने पढ़ा, “जब नारी दर्पण में खुद को ही नहीं निहारेगी। वरन बदलते वक्त के साथ, नारी की शक्ति को और निखारेगी।” संस्था के संरक्षक सुचर्चित विद्वान साहित्यकार श्री सुरेश पटवा ने पढ़ा कि “काश महफिल महीन हो जाए। आज शायर जहीन हो जाए।” पूर्व महाप्रबंधक श्री भरत केसवानी ने अपने पिता की स्मृति में उनका प्रिय गीत “न ये चांद होगा, न तारे रहेंगे” सुनाया। श्री लक्ष्मीकांत जवणे ने कविता “पिता का जूता” पढ़ी।” राजेश गर्ग ने पिता की स्मृति में पढ़ा, “वो बचपन की गलियां, वो सावन की फुहार। पिताजी की उंगली, वो निश्छल सा प्यार।” श्री संजय सरस ने भी पिता को याद करते हुए एक सुंदर कविता पढ़ी। श्री मधुरकांत चतुर्वेदी ने सूफियाना कविता में कहा कि, “देह की तू फिक्र न कर, जाएगी एक दिन बिखर। हो अमिट यदि लक्ष्य तेरा, पाएगा जीवन लहर।” श्री अरुण गुप्ता ने अपने सुप्रसिद्ध स्व. पिता श्री लक्ष्मी नारायण गुप्त देशबंधु द्वारा रचित “राम रहस्य” का पाठ किया। कार्यक्रम देर रात तक चला। कार्यक्रम में सभी श्रोता बंधु अंत तक बैठे रहे।

गोकुल सोनी
अध्यक्ष
स्टेट बैंक साहित्य एवं कला परिषद, भोपाल

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