बच्चों में अच्छे संस्कारों का बीजारोपण बाल साहित्य से ही संभव है
भोपाल। आज बाल साहित्य एवं बाल कल्याण शोध केंद्र के सभागार में कार्यक्रम “बाल साहित्य संवाद” का शुभारंभ किया गया। श्रृंखला की प्रथम कड़ी के रूप में बाल पत्रिका देवपुत्र के पूर्व संपादक, वरिष्ठ बाल साहित्यकार एवं साहित्य अकादमी भोपाल के निदेशक डॉ विकास दुबे का साक्षात्कार लिया गया। कार्यक्रम में साक्षात्कारकर्ता वरिष्ठ साहित्यकार श्री गोकुल सोनी ने श्री दवे से बाल साहित्य से जुड़े बहुत से प्रश्न पूछे जिनके श्री दवे ने बड़ी बेवाकी से अनेकों उदाहरणों के साथ रोचक एवं ज्ञानवर्धक शैली में उत्तर दिए।
कार्यक्रम का शुभारंभ श्रीमती सरोज दुबे द्वारा प्रस्तुत सरस्वती वंदना से एवं कार्यक्रम के संयोजक तथा बाल कल्याण एवं शोध केंद्र के निदेशक श्री महेश सक्सेना के स्वागत भाषण से हुआ। कार्यक्रम के बारे में जानकारी देते हुए श्री सक्सेना ने बताया कि इसमें प्रतिमाह किसी एक बाल साहित्यकार से पैंतालीस मिनट का साक्षात्कार होगा एवं अगले पैंतालीस मिनट में उनकी श्रेष्ठ रचनाओं का पाठ। कार्यक्रम की रिकॉर्डिंग एवं मीडिया, वागर्थ, शब्द शक्ति अंतरा तथा यू ट्यूब के माध्यम से प्रचार व्यवस्था श्री मनोज जैन मधुर एवं श्री बी एल गोहिया ने संभाली।
श्री गोकुल सोनी के प्रश्नों का उत्तर देते हुए डॉ विकास दवे ने बताया कि बहुत कम उम्र से उन्होंने लिखना आरम्भ कर दिया था और सबसे पहले “बच्चों की पाती संपादक के नाम” में तंबाकू के पैकेट पर बने श्रीगणेश जी के चित्र का विरोध करके किया था। जब श्री दवे से पूछा गया कि सरकार से इस क्षेत्र में उनकी क्या अपेक्षाएं हैं तब उन्होंने बताया कि सर्वप्रथम तो “महिला एवं बाल विकास” विभाग इकट्ठा न होकर “महिला विकास विभाग” अलग हो एवं “बाल विकास विभाग” अलग हो, तभी बच्चों का सर्वांगीण विकास किया जा सकेगा, दूसरे जैसे गुजरात में बाल विश्वविद्यालय स्थापित किया गया है, वैसे ही प्रत्येक राज्य की राजधानी में बच्चों के लिए विश्वविद्यालय हो। सरकार बच्चों के विकास को गंभीरता से ले एवं इसके लिए पृथक साहित्य अकादमी हो क्योंकि बच्चे ही देश का भविष्य होते हैं। उनमें अच्छे संस्कारों के बीजारोपण से ही देश को अच्छे और जिम्मेदार नागरिक मिलेंगे। अंत में श्री महेश सक्सेना और मनोज जैन मधुर ने सभी का आभार माना। कार्यक्रम की लाइव स्ट्रीमिंग श्रीमती कांता राय ने की। कार्यक्रम में बहुत बड़ी संख्या में साहित्यकारों ने भाग लिया।


