परम वंदनीय स्नेहशलिला वंदनीया माता भगवती देवी शर्मा के 100वें प्राकट्य दिवस 20 सितंबर पर विशेष- सजल श्रद्धामयी माता भगवती देवी
(21वीं सदी नारी सदी की उद्घोषिका माता भगवती देवी शर्मा)

अखिल विश्व गायत्री परिवार के संस्थापक संरक्षक ऋषियुग्म परम पूज्य गुरुदेव वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य एवं परम वंदनीया स्नेहशलिला माता भगवती देवी शर्मा सदा से दो शरीर एक प्राण बनकर रहे हैं। उन्हें भगवान शिव के अर्धनारीश्वर स्वरूप के रूप में देखा जाता रहा है ।परम पूज्य गुरुदेव सदा कहते रहे हैं कि हमारी शक्ति वंदनीया माताजी ही हैं।
आश्विन कृष्ण चतुर्थी 20 सितंबर 1926 को बौहरे परिवार में शुभ संकेत के साथ बेटी ने जन्म लिया। पिता श्री जसवंत बौहरे को पूर्व आभासों में देवी दर्शन और आगमन के संकेतों के कारण उसका नाम भगवती रखा गया प्यार से उन्हें लाली कहा जाने लगा। बचपन से ही दिव्य विलक्षण क्षमता के अनेक उदाहरण देखने को मिले – शिव भक्ति में लीनरहना, शिव को ही अपना साथी बताना आदि। अपनी भाभी की मित्र बन कर रहना एवं उन्हें समय-समय पर विलक्षण अनुभव बताना लाली की दिनचर्या बन गई थी।
सन् 1944 में परम पूज्य गुरुदेव के साथ परिणय सूत्र में बँधने के बाद माता भगवती देवी ने उनके सारे काम अपने हाथ में ले लिए और अखंड दीप का संरक्षण भी उनके हाथ में आ गया। अगले कुछ ही वर्षों में परम पूज्य गुरुदेव ने गायत्री तपोभूमि मथुरा के निर्माण का संकल्प लिया तो अपना सारा स्त्री धन (जेवर आदि) उसके निर्माण के लिए समर्पित कर दिया। घिया मंडी मथुरा स्थित अखंड ज्योति संस्थान में परिजनों का नियमित आना होने लगा था तब उनके भोजन की व्यवस्था स्वयं माताजी करती थीं। कोई कितने भी समय आए उसे भोजन की पूछना संकोच कर रहे परिजन के मन की बात जान लेना और उन्हें स्नेहपूर्वक भोजन कराना माताजी का स्वभाव बन गया था।
पुत्री वर्तमान में गायत्री तीर्थ शांतिकुंज हरिद्वार की अधिष्ठात्री शैल दीदी का विवाह जून 1970 में करने के तुरंत बाद गुरुदेव के साथ 24 देव कन्याओं को लेकर शांतिकुंज आश्रम में आ गईं। यहां पर देव कन्याओं के साथ 24 महापुरुश्चरण संपन्न कर गायत्री तीर्थ स्थान को जागृत करने हेतु माताजी ने महत्वपूर्ण साधनात्मक अभियान चलाया।
यहां पर सीमित संसाधनों की उपलब्धता के बाद भी सभी आगंतुकों की आवास एवं भोजन की समुचित व्यवस्था बनाए रखने के कारण माताजी का अन्नपूर्णा स्वरूप प्रकट दिखाई देने लगा। परम पूज्य गुरुदेव के साथ पत्राचार और हिमालय प्रवास के दौरान अखंड ज्योति का संपादन अपने अपने हाथ में लिया। यहां ध्यान देने योग्य बात है कि परम वंदनीया माताजी की स्कूली शिक्षा के कोई प्रमाण नहीं मिलते हैं फिर भी इतनी विशिष्ट अखंड ज्योति पत्रिका का सफल संपादन तथा परिजनों के पत्रों का स्नेहपूर्वक उत्तर देना, उनकी समस्याओं का समाधान पत्र के उत्तरों में करना माता जी की विलक्षण क्षमता के उदाहरण हैं।
परम पूज्य गुरुदेव द्वारा शांतिकुंज के परिजनों के साधनात्मक विकास के लिए कभी-कभी कठोर निर्णय लिए जाते थे जिससे बालरूप परिजन असहजता महसूस करते देखे गए ,तब वंदनीया माताजी ने उनमें परिवर्तन का निर्णय लेते हुए कहा कि कह देना माताजी ने कह दिया है अब ऐसा ही होगा । इस बात पर परिजनों की सहूलियत के लिए बड़े महत्वपूर्ण निर्णय किये दिए इससे उनके स्नेहसलिला स्वरूप का प्रकटीकारण होता रहा।
माताजी में विलक्षण गायन वादन क्षमता थी। आपने अनेक गीत गए और रिकॉर्डिंग कराई। गीतों के बारे में वंदनीया माताजी का स्वयं कहना है कि परम पूज्य गुरुदेव की लेखनी और हमारे गए गीत आगामी दिनों में परिजनों का मार्गदर्शन करेंगे।
परम पूज्य गुरुदेव की हिमालय यात्राओं एवं सूक्ष्मीकरण साधना के दौरान परम वंदनीया माताजी सभी आगंतुक विशिष्ट अभ्यगतों के साथ भेंट एवं परामर्श का क्रम स्वयं करती रहीं। आगंतुक, सभी सामान्य-विशेष लोग शांतिकुंज और गायत्री परिवार के प्रकल्पों की पूरी-पूरी प्रशंसा करके गए और सदा के लिए गायत्री परिवार के होकर रहे।
सन 1982 में माताजी ने एक भविष्यवाणी के तौर पर 21वीं सदी नारी सदी का उद्घोष किया। आपने बताया कि नारियों को सोने और चांदी दोनों तरह की बेड़ियो से मुक्त करने का समय आ गया है अर्थात् चांदी की बेड़ी सामाजिक प्रतिबंध और सोने की बेड़ियां अर्थात स्वयं द्वारा अपनाये जा रहे प्रतिगामी रीति रिवाजों, दोनों तरह के बंधनों से मुक्त होकर नारियां पुरुषों के साथ कदम से कदम मिलाकर आगे बढ़ेंगी ऐसा निश्चित है। उसे समय यह हास्यास्पद लगता था लेकिन आज यह चरितार्थ हो रहा है
गायत्री जयंती 2 जून 1990 को परम पूज्य गुरुदेव के महाप्रयाण के बाद एक शून्य की स्थिति बनने वाली-सी लग रही थी तब परम माताजी ने अपना शोक छोड़कर परिजनों में स्नेह ,दुलार और ममत्व का भाव फैलाया, स्वयं दुख की घड़ी में परिजनों में साहस बँधाया और मिशन की गतिविधियां के पूर्ण रूप से यथावत संचालन का क्रम बनाया। इस समय माता जी के ओजस्वी दुर्गा स्वरूप के दर्शन हुए। परम पूज्य गुरुदेव में स्वयं कहा था कि हमारे बाद मिशन का संचालन माताजी करेंगी और इसमें 100 गुनी प्रगति होगी।
गुरुदेव के महाप्रयाण के कुछ ही दिन बाद माताजी ने एक घोषणा की की परम पूज्य गुरुदेव की स्मृति में एक विश्व स्तरीय श्रद्धांजलि समारोह किया जाएगा इसके लिए शरद पूर्णिमा अक्टूबर 1990 की तारीख भी तय कर दी गई। समय बहुत कम था और पूरे बरसात के दिनों के ठीक बाद यह आयोजन होना था परिजन अपनी पूरी क्षमता के साथ इसकी तैयारी में लग गए और ठीक समय पर ऐतिहासिक विराट श्रद्धांजलि समारोह हरिद्वार में आयोजित हुआ जिसमें देश विदेश के लाखों परिजनों ने एक साथ भागीदारी की
इस आयोजन के बाद अगले ही वर्ष 1991 में माताजी ने एक और आयोजन शपथ समारोह की घोषणा की और परिजनों को शपथ के लिए शांतिकुंज आने का निमंत्रण भेजा। लाखों परिजन इस समारोह के लिए हरिद्वार पहुंचे। हम बरसों से यज्ञ भगवान से प्रार्थना – ‘अश्वमेधाधिक रचाएं – यज्ञ पर उपकार की’ करते आ रहे थे, परिजनों की यह प्रार्थना यज्ञ भगवान ने स्वीकार की ।देव संस्कृति दिग्विजय अभियान की आश्वमेधिक यज्ञ श्रृंखला आयोजन का माताजी ने उद्घोष किया और पहला आयोजन जयपुर शहर में करने की घोषणा भी कर दी गई। महाभारत के बाद अश्वमेध यज्ञ का आयोजन एक अलौकिक आध्यात्मिक आयोजन था जिसके लिए परिजन प्राणपण से जुट गए। स्वयं वंदनीया माताजी इस आयोजन में पधारीं और उन्होंने आगामी दिनों अनेक अश्वमेध यज्ञ आयोजनों की घोषणा की जिसमें स्वयं उपस्थित रहने का आश्वासन दिया। इस देव संस्कृति दिग्विजय अभियान के तहत देश-विदेश में अभी तक 48 अश्वमेध यज्ञ संपन्न हो चुके हैं। इन घोषणाओं और यज्ञों की सफलता से माता जी का शक्ति स्वरूपा स्वरूप प्रकट होने लगा।
भाद्रपद पूर्णिमा महालयारंभ 19 सितंबर 1994 को वंदनीया माता जी अपना स्थूल शरीर त्याग कर आराध्य परम पूज्य गुरुदेव से एकाकार हो गईं। परिजनों को यही आश्वासन देकर गई कि हमारे सशरीर न रहने पर भी हम दोनों सभी का मार्गदर्शन और संरक्षण सदा करते रहेंगे । मिशन का काम हजार गुना विस्तारित होगा। परम पूज्य गुरुदेव के आश्वासन के अनुसार ऋषि युग्म सजल श्रद्धा- प्रखर प्रज्ञा में समाहित होकर पूरे विश्व को वहां से ममत्व और संरक्षण प्रदान कर रहे हैं। इस स्थान पर जो भी आता है अपने मनोभाव प्रगट करता है कोई खाली हाथ नहीं जाता। अनेकानेक परिजनों के ऐसे ही मनोभाव सुनने में आए हैं।
वंदनीया माताजी शांतिकुंज को महाकाल का घोंसला और अपनी कोख कहती थीं अतः यहां 9 दिन रहने का विशेष महत्व है। इसीलिए यहां पर 9 दिवसीय संजीवनी साधना सत्र प्रतिमाह 1 से 9, 11 से 19एवं 21 से 29 तारीख तक चलाए जाते हैं जिन्हें पूर्व अनुमति के साथ कोई भी भागीदारी कर सकता है।
सारांश रूप में यह कहा जा सकता है की ऋषियों की तपःस्थली, प्राचीन पौराणिक नगरी हरिद्वार में गंगा के पावन तट पर बना हुआ यह आरण्यक जैसा गुरु का आश्रम एक जागृत गायत्री तीर्थ है एवं गायत्री की ऊर्जा वहां के कान-कान में विद्यमान है, जिसे वहां जाकर ही अनुभव किया जा सकता है।
शांतिकुंज की धरा पर रहने के बाद ही यह विश्वास हो जाता है कि गायत्री परिवार का घोष वाक्य- धरती पर स्वर्ग के अवतरण और मानव में देवत्व के उदय का साकार स्वरूप एक दिन अवश्य देखने को मिलेगा।
प्रस्तुति
जन जाग्रति केन्द्र
गायत्री शक्तिपीठ
एम पी नगर भोपाल
संपर्क सूत्र 9425373939



