टीईटी विवाद: शिक्षक कटघरे में क्यों?
टीईटी अनिवार्यता ने वर्षों से सेवा दे रहे शिक्षकों के मन में गहरी असुरक्षा और दर्द भर दिया है। बीस‑पच्चीस साल पढ़ाने के बाद अचानक उन्हें “अयोग्य” कहना सिर्फ नियम नहीं, आत्मसम्मान पर चोट है। हम सभी गुणवत्ता के पक्ष में हैं, लेकिन गुणवत्ता के नाम पर नौकरी की तलवार लटकाना अन्याय है। जिन शिक्षकों ने गाँव‑कस्बों में पीढ़ियाँ खड़ी कीं, आज वही अपनी नौकरी बचाने के लिए सड़कों पर हैं – यह किसी भी संवेदनशील समाज के लिए शर्म की बात है। हमारी सरल माँग है – पुराने शिक्षकों के लिए सम्मानजनक छूट या अलग व्यवस्था हो, प्रशिक्षण और सुधार हो पर धमकी नहीं हो, और नीतियाँ इंसान को “पद” नहीं, एक इंसान मानकर बनाई जाएँ। शिक्षक अकेले नहीं हैं; समाज, अभिभावक और विद्यार्थी मिलकर उनके साथ खड़े हों, क्योंकि आज मामला सिर्फ एक परीक्षा का नहीं, इंसाफ़ और संवेदना का है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद हालात ऐसे बना दिए गए हैं कि दशकों से पढ़ा रहे हजारों‑लाखों शिक्षकों के सिर पर दो साल की “टीईटी डेडलाइन” और जबरन रिटायरमेंट की तलवार लटका दी गई है। जिन शिक्षकों ने स्कूलों को खड़ा किया, रोशनी बाँटी, पीढ़ियाँ तैयार कीं, उन्हें एक झटके में “टेट दो, वरना घर जाओ” की लाइन में खड़ा कर देना न सिर्फ अन्याय है, बल्कि शिक्षक समाज का खुला अपमान है। नीति‑निर्माताओं और सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश को लागू तो तुरंत कर दिया, लेकिन जमीन पर बैठे शिक्षक की उम्र, स्वास्थ्य, पारिवारिक जिम्मेदारियाँ और 20–25 साल की ईमानदार सेवा को लगभग नज़रअंदाज़ कर दिया। सुधार और गुणवत्ता की आड़ में अगर नौकरी ही अस्थिर कर दी जाए, तो यह सुधार नहीं, असुरक्षा थोपना है। अगर वाकई उद्देश्य शिक्षा सुधार है तो व्यापक प्रशिक्षण, सहयोग और व्यावहारिक व्यवस्था बनाई जाए, न कि कोर्ट के आदेश के नाम पर पूरी पीढ़ी के शिक्षकों की कुर्बानी ली जाए। अब वक्त आ गया है कि शिक्षक समाज साफ‑साफ कहे – हम सुप्रीम कोर्ट के आदेश का सम्मान करते हैं, लेकिन बिना मानवीय और व्यावहारिक विकल्प दिए, इस आदेश को जस‑का‑तस लागू करना हमें स्वीकार नहीं है। हम भीख नहीं माँग रहे, हम संविधान द्वारा दिए गए सम्मान, न्याय और जीविका के अधिकार की बात कर रहे हैं। जिस दिन शिक्षक समाज संगठित होकर, तर्क और तथ्यों के साथ, लेकिन मजबूती से खड़ा होगा, उसी दिन व्यवस्था और सरकार दोनों को इस आदेश के दुष्परिणाम सुनने और सुधारने पड़ेंगे। कोर्ट के आदेश से पैदा हुए इस अन्याय का डटकर, लेकिन गरिमा के साथ विरोध करते रहना है।



