आचार्य जागरण शिविर : वैश्विक क्षितिज पर भारत के आध्यात्मिक आलोक का पुनरुदय
अद्वैत जागरण शिविर : 'कोऽहम्' से 'सोऽहम्' की महायात्रा

भारत केवल मानचित्र पर अंकित रेखाओं का संजाल नहीं है, और न ही यह केवल पर्वत-सरिताओं का जड़ समुच्चय है। भारत एक अविनाशी विचार है, एक कालजयी संस्कृति है और उससे भी बढ़कर, यह चैतन्य का वह शाश्वत स्पंदन है जिसने युगों पूर्व ऋषियों के कंठ से ‘ईशा वास्यमिदं सर्वं’ का अमृत उद्घोष किया था। उपनिषदों की यह ऋचा केवल एक मंत्र नहीं, अपितु इस ब्रह्मांडीय संविधान की वह प्रथम पंक्ति है, जो उद्घोषित करती है कि इस चराचर जगत के कण-कण में एक ही अद्वैत तत्व का विलास है।
जब संपूर्ण विश्व द्वंद्व, विभाजन और ‘स्व’ व ‘पर’ के संकीर्ण कुहासे में दिग्भ्रमित था, तब भारत की पुण्यधरा पर आचार्य शंकर का प्राकट्य हुआ। उन्होंने ‘अद्वैत’ के पीयूष से मानवता का अभिषेक किया। आज सदियों पश्चात, उसी आध्यात्मिक ज्योति को मध्य प्रदेश शासन के ‘आचार्य शंकर सांस्कृतिक एकता न्यास’ द्वारा ‘अद्वैत जागरण शिविर’ के माध्यम से पुनर्जीवित किया जा रहा है। यह मात्र एक आयोजन नहीं, अपितु मानवता के अंतर्मन को झंकृत करने का एक दैवीय अनुष्ठान है।
साधारणतः मनुष्य का अस्तित्व बाहरी जगत की उथल-पुथल, पद, प्रतिष्ठा और देह-बोध तक ही सीमित रह जाता है। आचार्य शंकर ने संसार को बोध कराया कि हम न नश्वर देह हैं, न चंचल मन, न ही अहंकार की सीमा; हम तो वह शुद्ध सच्चिदानंद हैं जो असीम और सर्वव्यापी है।
वैश्विक सहभागिता का विस्तार
आधुनिक युवा मानस को वेदांत के व्यावहारिक स्वरूप से साक्षात्कार कराने हेतु वर्ष 2020 में अद्वैत जागरण शिविर का संकल्प उपजा। आज ज्ञान की ये पवित्र गंगा देश-विदेश में मानवता के कल्याण का मार्ग प्रशस्त कर रही है। वर्तमान में अमेरिका, स्पेन, ब्राजील से लेकर इंडोनेशिया और तुर्की तक के जिज्ञासुओं का इन शिविरों में सम्मिलित होना इस बात का साक्ष्य है कि सत्य की पिपासा को भौगोलिक सीमाएँ नहीं बाँध सकतीं। अब तक देश के प्रतिष्ठित आध्यात्मिक केंद्रों में 45 से अधिक शिविरों के माध्यम से हजारों युवा इस ज्ञान-यज्ञ में अपनी समिधा अर्पित कर चुके हैं। स्पष्ट है कि भारत का आध्यात्मिक आलोक आज पुनः वैश्विक क्षितिज पर देदीप्यमान है और अद्वैत जागरण शिविर इसके निमित्त बने हैं।
यह शिविर केवल बौद्धिक विमर्श नहीं, अपितु 10 दिनों की गहन चित्त-शुद्धि का उपक्रम है। यहाँ युवा ब्रह्मनिष्ठ आचार्यों के सान्निध्य में श्रवण, मनन और निदिध्यासन की त्रिवेणी में स्नान करते हैं। विवेक चूडामणि से लेकर भज-गोविन्दम् तक के प्रकरण ग्रंथों का अध्ययन यहाँ मात्र शब्दों का रटन नहीं, बल्कि आत्म-रूपांतरण की प्रक्रिया बन जाता है।
विश्वभर से चयनित प्रतिभागी 10 दिनों तक ब्रह्मनिष्ठ आचार्यों की दिव्य सन्निधि में आचार्य शंकर विरचित प्रकरण ग्रंथ जैसे-आत्मबोध, तत्त्वबोध, भज-गोविन्दम्, मनीषा पंचकम्, साधना पंचकम् और विवेक चूडामणि का अध्ययन, श्रवण-मनन एवं निधिध्यासन की प्रक्रिया से एकात्मता के भाव को आत्मसात करते है।
हिमालय से कन्याकुमारी तक: एकात्मता की गूँज
आचार्य शंकर सांस्कृतिक एकता न्यास द्वारा आयोजित अद्वैत जागरण शिविरों ने भारत की सांस्कृतिक एकता को पुनः पिरोने का कार्य किया है। भारत के उत्तर से लेकर दक्षिण तक विभिन्न आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्रों पर यह शिविर संपन्न हुए हैं।
अद्वैत जागरण शिविर’ की शुरुआत वर्ष 2020 में हुई। पहला शिविर ब्रह्मलीन पूज्यस्वामी संवित् सोमगिरि जी की दिव्य सन्निधि में मांउटआबू में आयोजित हुआ। अब तक 45 शिविरि देश के प्रमुख प्रतिष्ठित आश्रमों जिसमें हिमालय की पावन गोद में स्थित अद्वैत आश्रम-मायावती, कल-कल बहती मां गंगा के पावन तट पर दयानन्द आश्रम-ऋषिकेश, आचार्य शंकर की जन्मस्थली में चिन्मय इंटरनेशनल फाउण्डेशन-केरल, चिन्मय विभूति-पुणे, चिन्मय गार्डन्स-कोयम्बटूर, चिन्मय तपोवन-उत्तरकाशी, आर्ष विद्या मंदिर-राजकोट, शारदा तपोवन-टिहरी, चिन्मय तरंगिनी-चैन्नई एवं श्री श्री ओंकारेश्वर आश्रम में आयोजित हुए। इन शिविरों में भारत के साथ ही विश्व के विभिन्न देशों के प्रतिभागियों ने भी राज्य एवं राष्ट्र की सीमाओं से परे जाकर स्वयं की खोज हेतु इन शिविरों में सहभागिता की।
इस वर्ष वैशाख शुक्ल पंचमी ‘आचार्य शंकर प्रकटोत्सव’ के अवसर पर 18 अद्वैत जागरण शिविरों के नेपाल, बांग्लादेश एवं भारत के 25 राज्यों से अधिक राज्यों से आए 700 प्रतिभागी पुण्य सलिला सदानीरा मां नर्मदा के पावन तट पर आचार्य शंकर की दीक्षा एवं संन्यास भूमि ओंकारेश्वर में ‘शंकरदूत’ के रूप में दीक्षा परिणीत हुए। इन युवाओं में भारतीय सेना में कार्यरत लेफ्टिनेंट कर्नल , सर्जेन्ट, आईआईटीएन , आईआईएम, सीनियर वैज्ञानिक, डॉक्टर्स, प्रोफेसर, कलाकारों ने सहभागिता की।
आचार्य शंकर की दीक्षा एवं संन्यास भूमि ओंकारेश्वर में ‘शंकरदूत’ के रूप में दीक्षा ग्रहण कर ‘आत्मनो मोक्षार्थम् जगद्धिताय च’ के भाव से अपने मोक्ष और जगत् के कल्याण के लिए संकल्पित हो रहे हैं।
अद्वैत जागरण शिविर की इस शृंखला में अब तक 2000 शंकरदूत अद्वैत वेदान्त के विश्वव्यापी लोकव्यापीकरण में अपनी भूमिका निभा रहे हैं।यह शंकरदूत “एक प्रबुद्ध व्यक्ति बनकर आदर्श समाज, उन्नत राष्ट्र और मंगलमय विश्व के निर्माण हेतु मन, वचन और कर्म से जीव, जगत और ईश्वर के मूलभूत एकात्म भाव को आत्मसात करेंगे।”
डॉ.शुभम चौहान

