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प्रकृति के साथ निर्माण हमारी प्राचीन भारतीय स्थापत्य परंपरा का मूल है: मनोज मीक

ग्रीन बिल्डिंग पर भोपाल से देश को संदेश: आधुनिक निर्माण को राजा भोज की समरांगण दृष्टि से जोड़ने का समय

ग्रीन बिल्डिंग तकनीक पर भोपाल में आयोजित अखिल भारतीय सेमिनार को क्रेडाई भोपाल के अध्यक्ष मनोज मीक ने महत्वपूर्ण और समयानुकूल पहल बताया है। उन्होंने कहा कि यह आयोजन आधुनिक निर्माण तकनीक पर चर्चा के साथ-साथ भोपाल की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान को नए संदर्भ में समझने का अवसर भी है।

मनोज मीक ने कहा कि भोपाल मेट्रोपॉलिटन रीजन आज का शहरी विस्तार भर नहीं है। यह भूभाग भीमबेटका की स्टोन एज परंपरा से लगभग एक लाख वर्ष पुरानी मानव उपस्थिति का साक्षी रहा है। उस समय मनुष्य ने प्रकृति, जल, पहाड़, हवा, प्रकाश, छाया और भू-आकृति के साथ संतुलन बनाकर जीवन रचा। यही नैसर्गिक ज्ञान आगे चलकर भारतीय स्थापत्य परंपरा का आधार बना। विद्वान राजा भोज ने इसी दृष्टि को एक हज़ार साल पहले अपने ग्रंथ समरांगण सूत्रधार में नगर योजना, भवन निर्माण, जल प्रबंधन, दिशा, मार्ग, उद्यान और लोक जीवन के संदर्भ में विस्तार दिया।

उन्होंने कहा कि समरांगण सूत्रधार का पुरनिवेश अध्याय आज की ग्रीन बिल्डिंग सोच के बहुत निकट दिखाई देता है। इसमें नगर बसाने से पहले नदी, पर्वत, जलाशय, भूमि और उपयोगिता को समझने की बात आती है। एक महत्वपूर्ण श्लोक है:

समरांगण सूत्रधार | पुरनिवेशो दशमोऽध्यायः | श्लोक 51

दृष्ट्वा दृष्ट्वोपभोगार्हान् सरिद्गिरिजलाशयान्।
पक्षद्वाराणि कुर्वीत स्वेच्छया तत्र तत्र च॥

इसका भाव है कि नगर की योजना बनाते समय उपयोगी नदियों, पर्वतों और जलाशयों को देखकर, उनके अनुसार मार्ग, द्वार और व्यवस्था बनाई जानी चाहिए। यह श्लोक बताता है कि भारतीय परंपरा में निर्माण का अर्थ दीवारें खड़ी करना नहीं था, निर्माण का अर्थ था प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाकर जीवन योग्य स्थान तैयार करना।

मनोज मीक ने कहा, “आज जब ग्रीन बिल्डिंग, ऊर्जा बचत, जल संरक्षण, प्राकृतिक वेंटिलेशन और पर्यावरण अनुकूल निर्माण की चर्चा हो रही है, तब भोपाल से यह बात पूरे देश तक जानी चाहिए कि यह विचार हमारी परंपरा में बहुत पहले से मौजूद रहा है। राजा भोज की समरांगण दृष्टि बताती है कि सही निर्माण वही है, जो भूमि, जल, हवा, दिशा, छाया और मनुष्य के स्वास्थ्य को साथ लेकर चले।”

उन्होंने कहा कि भोपाल में देश भर के अभियंताओं और विशेषज्ञों की उपस्थिति इस दृष्टि से विशेष है कि वे इस ऐतिहासिक राजधानी से यह संदेश लेकर जाएँ कि भविष्य का निर्माण कंक्रीट और तकनीक के साथ प्रकृति, परंपरा और विज्ञान के संतुलन से होगा। मध्यप्रदेश सरकार का ग्रीन बिल्डिंग तकनीक पर निर्णय स्वागतयोग्य है। अब आवश्यकता है कि इस नीति में स्थानीय जलवायु, स्थानीय सामग्री, जल प्रबंधन, हरित क्षेत्र, सौर ऊर्जा, वर्षा जल संचयन और पारंपरिक भारतीय स्थापत्य ज्ञान को व्यावहारिक रूप से जोड़ा जाए।

मीक ने कहा कि आधुनिक इंजीनियरिंग और राजा भोज की समरांगण परंपरा को साथ रखा जाए, तो मध्यप्रदेश देश को ग्रीन बिल्डिंग का एक भारतीय और स्थानीय मॉडल दे सकता है। यही वास्तव में “लोक निर्माण से लोक कल्याण” की दिशा है।

 

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