

रूस की राजधानी मॉस्को में याउज़ा नदी के किनारे एक ऐसी यूनिवर्सिटी है, जिसकी पहचान बाहर से तो एक प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग कॉलेज की है, लेकिन इसकी दीवारों के पीछे कुछ और ही खिचड़ी पक रही है. यहां के क्लासरूम में छात्र सिर्फ रॉकेट साइंस या कोडिंग नहीं सीखते, बल्कि उन्हें सिखाया जाता है कि किसी दूसरे देश की संसद को कैसे हैक करना है, चुनावों में कैसे धांधली करनी है और कैसे दुष्प्रचार (प्रोपेगेंडा) के जरिए दुनिया की सोच को बदलना है. पुतिन के इस ‘सीक्रेट हैकर स्कूल’ का खुलासा हाल ही में लीक हुए 2,000 से ज्यादा खुफिया दस्तावेजों से हुआ है.
द गार्डियन की रिपोर्ट के मुताबिक, अप्रैल के महीने में जब राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने बाऊमन मॉस्को स्टेट टेक्निकल यूनिवर्सिटी का दौरा किया, तो सरकारी मीडिया ने इसे अंतरिक्ष अभियानों और विज्ञान की प्रगति से जोड़ा था. लेकिन उस भव्य रिपोर्टिंग में कहीं भी ‘डिपार्टमेंट-4’ का जिक्र नहीं था. असल में यही वह जगह है जिसे ‘स्पेशल ट्रेनिंग’ विभाग कहा जाता है और यहीं से रूस की मिलिट्री इंटेलिजेंस एजेंसी (GRU) के लिए सबसे तेज तर्रार साइबर जासूस तैयार किए जाते हैं.
डिपार्टमेंट-4 है जासूसों की फैक्ट्री
इस यूनिवर्सिटी में ‘डिपार्टमेंट-4’ के नाम से चलने वाला यह गुप्त विभाग सीधे रूसी सेना की खुफिया इकाई (GRU) के इशारे पर चलता है. द गार्डियन के मुताबिक, दस्तावेजों से पता चला है कि यहां कोई आम प्रोफेसर नहीं, बल्कि सेना के बड़े अधिकारी छात्रों की परीक्षा लेते हैं और उनके करियर का फैसला करते हैं. इस विभाग के प्रमुख लेफ्टिनेंट कर्नल किरिल स्तुपाकोव हैं, जो खुद सिग्नल इंटेलिजेंस के माहिर खिलाड़ी हैं.इस जासूसी स्कूल में छात्रों को ऐसे गैजेट्स दिखाए और सिखाए जाते हैं जो किसी जेम्स बॉन्ड फिल्म से कम नहीं हैं. जैसे एक ऐसा स्मोक डिटेक्टर जो असल में कैमरा है या एक ऐसी मॉनिटर केबल जो चुपके से स्क्रीनशॉट लेकर छिपे हुए फ्लैश ड्राइव में सेव करती रहती है. छात्रों को सिखाया जाता है कि कैसे कीबोर्ड और कंप्यूटर के बीच एक डिवाइस लगाकर हर टाइप किया गया शब्द चुराया जा सकता है.
सिलेबस में शामिल है हैकिंग
यहां की पढ़ाई 144 घंटों के गहन कोर्स में बंटी हुई है, जिसमें ‘तकनीकी जासूसी से बचाव’ जैसे विषय पढ़ाए जाते हैं. लेकिन इसका असली मकसद हमला करना सिखाना है. छात्रों को पासवर्ड क्रैक करना, सॉफ्टवेयर की कमियां ढूंढना और ‘ट्रोजन’ जैसे खतरनाक वायरस बनाना सिखाया जाता है. मजे की बात तो यह है कि परीक्षा पास करने के लिए छात्रों को खुद एक वर्किंग कंप्यूटर वायरस तैयार करना पड़ता है और ‘पेनेट्रेशन टेस्ट’ (सिस्टम में सेंधमारी) करके दिखाना होता है.
सिर्फ कोडिंग ही नहीं, यहां ‘इंफॉर्मेशन वॉरफेयर’ यानी सूचना युद्ध की भी ट्रेनिंग दी जाती है. छात्रों को सिखाया जाता है कि कैसे सोशल मीडिया पर फर्जी वीडियो और प्रोपेगेंडा फैलाकर किसी देश की जनता के दिमाग को बदला या काबू में किया जा सकता है. उन्हें यूक्रेन युद्ध को जायज ठहराने वाली रूसी विचारधारा घुट्टी की तरह पिलाई जाती है, ताकि वे पूरी निष्ठा के साथ पश्चिमी देशों के खिलाफ साइबर हमले कर सकें.


