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ईरान के पास तैनात USS लिंकन पर सैनिकों की बिगड़ी मानसिक हालत, युद्धपोत से कूदने तक कैसे पहुंची बात

अमेरिका-ईरान जंग के बीच यूएसएस अब्राहम लिंकन पर तैनात अमेरिकी सैनिकों में भोजन की कमी और मानसिक अवसाद। जानें 250 दिनों की अनिश्चित तैनाती और ईरानी हमलों का पूरा सच।अमेरिका-ईरान के बीच बीते पांच महीने से जारी युद्ध का असर अब पश्चिम एशिया में मौजूद देशों और होर्मुज पर निर्भर देशों से कहीं आगे तक बढ़ चुका है। शुरुआत में अमेरिका पर इस युद्ध का असर सीमित ही था। हालांकि, अब उसके सैनिक इस संघर्ष में बुरी तरह प्रभावित होने लगे हैं। ताजा मामला अमेरिकी युद्धपोत यूएसएस अब्राहम लिंकन पर लगातार खराब होती स्थिति और इसका शिकार हुए हजारों सैन्यकर्मियों से जुड़ा है। दरअसल, पिछले साल नवंबर से ही अमेरिकी सैन्य बंदरगाह से निकलने के बाद यह युद्धपोत जलक्षेत्र में है और अब करीब 250 दिन के बाद इस एयरक्राफ्ट कैरियर पर खाने की कमी, प्लंबिंग की समस्या और मानसिक थकान की शिकायतें सामने आ रही हैं।

मौजूदा समय में यूएसएस लिंकन पर करीब पांच हजार सैन्य कर्मी तैनात हैं, जिनमें सेना, नौसेना के कर्मी और हजारों मरीन हैं। कुछ रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि हालात इतने खराब हैं कि कुछ सैनिक इस एयरक्राफ्ट कैरियर से समुद्र में कूदने की कोशिश तक कर चुके हैं, वहीं कुछ कर्मी आत्महत्या तक को लेकर चर्चाएं तक कर रहे हैं। इन स्थितियों की गंभीरता को देखते हुए अमेरिका अब जल्द क्षेत्र में नया विमानवाहक पोत तैनात करने की तैयारी कर रहा है, जिसके बाद यूएसएस लिंकन की वापसी संभव होगी।

ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर अमेरिका और ईरान के बीच बीते कुछ महीनों से जारी संघर्ष का अब तक अमेरिकी सेना पर क्या और कितना असर पड़ा है? जिस यूएसएस अब्राहम लिंकन की स्थिति पर चिंता जताई जा रही है, उसमें हालात कैसे हैं? हालात इतने खराब कैसे हो गए और इसके लिए ईरानी हमले कैसे जिम्मेदार हैं? इसके अलावा पहले किस युद्धपोत में ऐसी ही स्थिति पैदा हो चुकी है? आइये जानते हैं…

अमेरिका-ईरान युद्ध का दोनों देशों की सेनाओं पर कितना असर?

1. अमेरिका को नुकसान
28 फरवरी को अमेरिका की तरफ से ईरान के खिलाफ हमला बोला गया था। इस संघर्ष को ऑपरेशन एपिक फ्यूरी नाम दिया गया। हालांकि, शुरुआती नुकसानों के बाद अमेरिका के हमले का ईरान ने भी मुहंतोड़ जवाब दिया और पश्चिम एशिया में उसके ठिकानों को अपनी बैलिस्टिक मिसाइलों और ड्रोन्स से भारी नुकसान पहुंचाया।

अमेरिकी सेना के जिन सैनिकों की मौत हुई, उनमें जुलाई में जॉर्डन के मुवफ्फक साल्टी एयर बेस पर हुए हमलों में मारे गए फर्स्ट लेफ्टिनेंट टायलर जेम्स फीहान, प्राइवेट इसाबेला गोंजालेस, सार्जेंट एंजेल एस. रामप्रसाद और इराक में एक ड्रोन के नियंत्रित विस्फोट के दौरान मारे गए सार्जेंट माइकल इमैनुएल स्विंटन शामिल हैं।

इन सबसे इतर अमेरिका को सैन्य उपकरणों का भारी नुकसान हुआ है। उसके अरबों डॉलर की रक्षा प्रणालियां और ड्रोन्स और एयरक्राफ्ट्स इस युद्ध में तबाह हुए हैं। इसके अलावा युद्धपोत यूएसएस जेराल्ड आर. फोर्ड और अब यूएसएस अब्राहम लिंकन में तैनात सैनिकों को भी इस युद्ध में दिक्कतें झेलनी पड़ी हैं। . ईरान को नुकसान
ईरानी सैन्य बलों को इस युद्ध में भीषण नुकसान उठाना पड़ा है। ईरान की तरफ से अब तक अपने नुकसान का ब्योरा पेश नहीं किया गया है। हालांकि, अनुमान बताते हैं कि 1,800 से 7,650 ईरानी सैनिक मारे गए हैं। जहां ईरानी सरकारी मीडिया लगभग 1,800 शहीदों की बात स्वीकार करता है, वहीं इस्रइली सेना (आईडीएफ) और अन्य स्वतंत्र स्रोतों के अनुसार यह संख्या 6,000 से 7,650 के बीच हो सकती है।

ईरानी सेना के लिए सबसे बड़ा रणनीतिक झटका उसके शीर्ष नेतृत्व की मौत को जाना रहा है। इसमें सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामनेई, आईआरजीसी के कमांडर-इन-चीफ होसैन सलामी और सशस्त्र बलों के चीफ ऑफ स्टाफ मोहम्मद बाघेरी जैसे प्रभावशली नाम शामिल हैं। इस बड़ी क्षति की वजह से ईरान को युद्ध के बीच में ही नए कमांडरों की नियुक्तियां करनी पड़ी हैं। दूसरी तरफ स्वतंत्र उपग्रह इमेजरी और सैन्य विश्लेषणों के मुताबिक, ईरान के रक्षा ढांचे को गहरा नुकसान पहुंचा है।
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कितने खराब हैं सैनिकों के हालात?

ईरान युद्ध के चलते लगातार बढ़ाई जा रही अनिश्चित तैनाती और बुनियादी सुविधाओं के भारी अभाव ने सैनिकों को गंभीर मानसिक अवसाद और थकावट से भर दिया है। इस मानसिक तनाव के बीच कई सैनिकों ने जहाज से कूदकर जान देने की कोशिश की है। 3 अगस्त 2026 को एक अमेरिकी सैनिक सचमुच समुद्र में कूद गया था। उसे तुरंत सर्च एंड रेस्क्यू हेलीकॉप्टर की मदद से पानी से सुरक्षित निकाला गया, जहाज के चिकित्सा विभाग में उसका प्राथमिक इलाज किया गया और फिर आगे की देखभाल के लिए जहाज से बाहर भेज दिया गया।

सीएनएन की रिपोर्ट के मुताबिक, एक और सैनिक ने भी लंबे समय तक समुद्र में रहने के बाद जहाज से कूदने का प्रयास किया था, जिसके बाद उन्हें मेडिकल होल्ड पर रख दिया गया है। सैनिक की पत्नी के मुताबिक, उनके पति इस बात से डरे हुए हैं कि मानसिक तनाव और थकावट के कारण उनके 13 साल के करियर को कहीं कोर्ट-मार्शल या डिसऑनरेबल डिस्चार्ज के साथ खत्म न कर दिया जाए।

एक अन्य घटना में, ड्यूटी पर तैनात एक सजग सैनिक ने अपने एक साथी को कूदने के प्रयास के दौरान हवा में ही पकड़ लिया और अन्य सहकर्मियों की मदद से उसे सुरक्षित फ्लाइट डेक पर खींच लिया।

एक सैनिक के रिश्तेदार ने साझा किया कि उन्हें व्हाट्सएप पर मैसेज मिला- “मैं बुरी तरह थक चुका हूं। दिन-रात जहाज के इंजन के शोर और विमानों के उड़ने के भीषण कंपन के कारण सोते, जागते या नहाते समय भी मन में कभी शांति का एक क्षण नहीं मिलता।” एक अन्य सैनिक की पत्नी ने बताया कि उनके पति ने उन्हें संदेश भेजकर कहा था, “मैं उम्मीद करता हूं कि कल सुबह मेरी आंख ही न खुले।”

हालात इतने खराब कैसे हो गए, इसके लिए ईरानी हमले कैसे जिम्मेदार? 

यूएसएस अब्राहम लिंकन पर आए इस भीषण रसद संकट के पीछे ईरान की सोची-समझी सैन्य रणनीति और सटीक हमले सीधे तौर पर जिम्मेदार हैं…

बहरीन के प्रमुख नौसैनिक अड्डे की तबाही
युद्ध की शुरुआत में ही ईरानी मिसाइलों और आत्मघाती ड्रोनों के भीषण हमलों ने बहरीन में स्थित अमेरिकी नौसेना के प्रमुख रसद और आपूर्ति केंद्र को पूरी तरह तबाह कर दिया था। यह अड्डा अमेरिकी नौसेना के लिए दशकों से खाड़ी क्षेत्र में रसद आपूर्ति और सैनिकों के आराम का सबसे बड़ा लाइफलाइन हब था। इस हब के नष्ट होते ही पूरी आपूर्ति व्यवस्था बिखर गई।

2200 मील दूर हिंद महासागर में आपूर्ति केंद्र का खिसकना
बहरीन के नष्ट होने के बाद, अमेरिकी सेना को मजबूरन अपनी पूरी लॉजिस्टिक्स चेन खाड़ी से 2200 मील दूर हिंद महासागर में स्थित डिएगो गार्सिया द्वीप पर ट्रांसफर करनी पड़ी। इतनी भारी भौगोलिक दूरी की वजह से यूएसएस अब्राहम लिंकन तक समय पर ताजी सब्जियां, राशन, दवाएं, स्वच्छता उत्पाद और सैनिकों-कर्मियों के घर से भेजे गए पार्सल पहुंचाना बेहद मुश्किल, धीमा और अनिश्चित हो गया है।

जमीन पर उतरने की संभावना भी खत्म 
सामान्य परिस्थितियों में तैनाती के दौरान सैनिक हर कुछ हफ्तों में बहरीन या संयुक्त अरब अमीरात (यूएई के फुजैराह जैसे मित्र बंदरगाहों पर कुछ दिन आराम के लिए जमीन पर उतरते हैं। लेकिन ये बंदरगाह अब ईरानी मिसाइलों की सीधी मारक सीमा में हैं। हमलों के जबरदस्त खतरे की वजह से अमेरिकी कमांडरों के पास इन विशालकाय और महंगे विमान वाहक पोतों को बंदरगाह पर लाने की गुंजाइश नहीं है, जिसकी वजह से सैनिकों को लगातार समुद्र में ही कैद रहना पड़ रहा है।

युद्ध में लगातार काम करते रहने का दबाव
ईरानी सेना की तरफ से लगातार दागे जा रहे सैकड़ों मिसाइलों और आत्मघाती ड्रोनों को हवा में ही मार गिराने और ईरान की समुद्री नाकेबंदी को लागू रखने के लिए जहाज को लगातार युद्धक मोड में रहना पड़ रहा है। चालक दल ने अब तक लगभग 10,000 लड़ाकू उड़ानें संचालित की हैं, जिसने उन्हें चौबीसों घंटे बिना रुके काम करने और भारी मानसिक तनाव झेलने पर मजबूर किया है।

इस स्थिति पर कैसे आमने-सामने है ट्रंप सरकार और विपक्ष?

1. ट्रंप सरकार और सैन्य नेतृत्व का रुख

  • राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और रक्षा विभाग (पेंटागन) के शीर्ष अधिकारियों ने जहाज पर मानसिक स्वास्थ्य संकट, सैनिकों के जहाज से कूदने के प्रयासों और बुनियादी संसाधनों की कमी की रिपोर्टों को लगातार खारिज किया है या बहुत मामूली बताया है।
  • सरकार और सैन्य कमांडरों का मानना है कि ईरान के साथ जारी संघर्ष और नाकेबंदी को बनाए रखने के लिए ऐसी रिकॉर्ड-तोड़ लंबी तैनाती राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बेहद जरूरी और पूरी तरह से टिकाऊ है। वे इसे सैनिकों की मजबूती और कर्तव्य के रूप में पेश कर रहे हैं।

2. विपक्ष और सांसदों का रुख 

  • विपक्षी डेमोक्रेटिक सांसदों और सैन्य जानकारों का तर्क है कि लगातार तैनाती बढ़ाना और सैनिकों को दूषित पानी, भोजन की राशनिंग और बिना स्वच्छता सुविधाओं के रखना अमानवीय है। उन्होंने इसे सरकार द्वारा सैनिकों की बुनियादी जरूरतों की गंभीर उपेक्षा करार दिया है।
  • एरिजोना के सीनेटर मार्क केली और रूबेन गैलेगो जैसे सांसदों ने इस दयनीय स्थिति पर गहरा आक्रोश व्यक्त करते हुए पेंटागन से तीखे सवाल पूछे हैं और जहाज की सुरक्षा व जीवन स्थितियों को लेकर औपचारिक संसदीय जांच की मांग की है

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