खबरमध्य प्रदेश

पंचकन्याओं का स्मरण केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि नारी के अदम्य साहस, धैर्य, त्याग, आत्मबल और जीवन-संघर्ष की स्मृति है

संभावना गतिविधि में कुंती लीला-नाट्य, डण्डा एवं गदली नृत्य की प्रस्तुति हुई

पौराणिक आख्यान न बनाकर नारी के साहस, त्याग, निर्णय और आत्मबल की गाथा के रूप में प्रस्तुत किया गया। युवावस्था में प्राप्त एक दिव्य वरदान, कर्ण के जन्म का रहस्य, पांडवों की माता के रूप में उनकी भूमिका, वनवास की पीड़ा, राजसत्ता के संघर्ष और महाभारत के महासंग्राम के बीच भी कुन्ती अपने धैर्य, विवेक और मातृत्व से विचलित नहीं होतीं। वे केवल पांडवों की माता नहीं, बल्कि भारतीय नारी के उस स्वरूप का प्रतिनिधित्व करती हैं, जो विपरीत परिस्थितियों में भी अपने कर्तव्य और आत्मसम्मान को बनाए रखती है।

डण्डा नृत्य

डण्डा नृत्य पूरे देश के लोक और जनजातीय क्षेत्रों में विभिन्न अवसरों पर किया जाता है। डण्डा वादन के रूप में उपयोग किये जाने वाला संभवतः पहला वाद्य है। मध्यप्रदेश की गोण्ड जनजाति और अन्य अंचलों में डण्डा नृत्य का प्रचलन है, जिसे कहीं-कहीं सैला, सैरा, लहंगी आदि नामों से भी जाना जाता है। प्रदेश के निमाड़ अंचल में हरदा क्षेत्र के गोण्ड समुदाय द्वारा डण्डा नृत्य हरियाली अमावस्या से लेकर पोला अमावस्या तक धूमधाम से किया जाता है। वर्षाकाल में प्रायः यह नृत्य धूम-धाम से किया जाता है, जिसमें सभी ग्रामीणजन हिस्सेदारी करते हैं। रक्षाबंधन के बाद भुजरिया के अवसर पर भी इस नृत्य का प्रचलन है। नृत्य में ढोल मांदल, झांझ, मंजीरा, बांसुरी, डण्डा आदि का प्रयोग कर गीत-गायन के साथ नृत्य किया जाता है।

गदली नृत्य

यह शादी-विवाह के अवसर पर किया जाने वाला कोरकू स्त्रियों का प्रसिद्ध नाच है। पुरुष बाँसुरी, अलगोझा, ढोल, ढोलक, टिमकी और झाँझ बजाते हैं। बाँसुरी और अलगोझा की लोक धुन पर स्त्रियाँ हाथों में चिटकोरा बजाती हुईं विभिन्न मुद्राओं में बहुत ही आकर्षक व मनमोहक नृत्य करती हैं। पुरुष वादक भी मस्ती में झूम-झूमकर नृत्य करते हुए वाद्यों को गति प्रदान करते हैं। जैसे-जैसे वाद्यों की गति बढ़ती है, नृत्य में भी उतना निखार आता जाता है। शनैः शनैः नृत्य जब तीव्र होने के साथ ही साथ अपनी चरम सीमा पर पहुँचता है तो बहुत ही लुभावना और दर्शनीय होता है। रात-रात भर होने वाला कोरकू स्त्रियों का बहुत ही लोकप्रिय नाच है।

मध्यप्रदेश जनजातीय संग्रहालय में हर रविवार को दोपहर 02 बजे से आयोजित होने वाली इस गतिविधि में मध्यप्रदेश के पांच लोकांचलों एवं सात प्रमुख जनजातियों की बहुविध कला परंपराओं की प्रस्तुति के साथ ही देश के अन्य राज्यों के कलारूपों को देखने समझने का अवसर भी जनसामान्य को प्राप्त होगा।

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