विश्ववाणी हिन्दी संस्थान अभियान भोपाल अखिल भारतीय दिव्य नर्मदा अलंकरण २०२५ – २०२६
हिंदी की अवहेलना करनेवाले मातृद्रोही - आचार्य संजीव सलिल

भोपाल। अखिल भारतीय ख्याति प्राप्त संस्था विश्ववाणी हिन्दी संस्थान अभियान जबलपुर द्वारा वर्ष २०२५-२०२६ के दिव्य नर्मदा अलंकरण के अंतर्गत देश के विविध प्रांतों के ३० रचनाकारों को श्रेष्ठ सृजन हेतु अलंकरण पत्रों, पुस्तकों तथा साठ हजार रुपए नगद सम्मान निधि से अलंकृत किया गया। इस अवसर पर दुष्यंत कुमार पांडुलिपि संग्रहालय में सभापति आचार्य संजीव वर्मा ”सलिल” ने हिंदी की व्यापकता, उपादेयता तथा प्रभाव में हो रही वृद्धि को रेखांकित करते हुए कहा कि मातृभाषा और राजभाषा हिंदी की अनदेखी और अवहेलना करनेवाले भाषा द्रोही मातृ द्रोही और समाज द्रोही हैं। हिंदी भाषा से संस्कार निर्माण और राष्ट्रीय एकता
जनित स्वातंत्र्य समर व सत्याग्रहों तथा आजादी के बाद निहित राजनैतिक स्वार्थों के कारण हिंदी विरोध के कारण हुई क्षति का सम्यक् विश्लेषण करते हुए वक्ता ने सभी विषयों की उच्च तकनीकी शिक्षा हिंदी तथा प्रमुख भारतीय भाषाओं में तत्काल दिए जाने को अपरिहार्य निरूपित किया।
”हिन्दी में उच्च तकनीकी शिक्षा : समस्याएँ, समाधान एवं संभावनाएँ” विषय पर सत्राध्यक्ष प्रो. डॉ. अर्जुन चव्हाण से. नि. विभागाध्यक्ष शिवाजी विश्व विद्यालय कोल्हापुर ने भारत सरकार द्वारा विषय / विधावार तकनीकी
शब्द कोश निर्माण समितियों के कार्यानुभवों का उल्लेख करते हुए हिंदी को संस्कृतनिष्ठ जटिलता से मुक्त कर देशज सरसता- सरलता युक्त करने की अपील की। रोमन की बोर्ड की तरह हिंदी में केवल एक की बोर्ड की जरूरत वक्ता ने प्रतिपादित की।
श्रेष्ठ-ज्येष्ठ साहित्यकार श्री गोकुल शर्मा के कुशल संचालन में सर्व श्री नरेंद्र दीपक, डॉ. संजय सक्सेना, डॉ. वीणा सिन्हा. डॉ.राजेश श्रीवास्तव, इं. राग तेलंग,
इं. सुरेंद्र सिंह पंवार ने उच्चतम तकनीकी शिक्षा हेतु हिंदी को माध्यम बनाए जाने की माँग की। दंत चिकित्सा, पशु चिकित्सा, देखा, प्रबंधन आदि का शिक्षण अभियांत्रिकी तथा आयुर्विज्ञान की तरह हिंदी में तुरंत आरंभ किए जाने को वक्ताओं ने जरूरी बताया।
इसके पूर्व आचार्य संजीव ‘सलिल’ की लघुकथा कृति, दो उड़िया अनुवाद, सरला वर्मा की संस्मरण कृति’ ममता के गाँव’, राग तेलंग के काव्य संग्रह ‘सुपर मून @ ०७६१’ तथा सतीश श्रीवास्तव के व्यंग्य लेख संग्रह ‘भरा नहीं जो भाव से’ का विमोचन किया गया।
अलंकरण सत्र मेंडॉ. अर्जुन चव्हाण कोल्हापुर, महाराष्ट्र को हिन्दी भाषा, व्याकरण, साहित्य सृजन और शोध के क्षेत्र में असाधारण योगदान के लिए जगदीश किंजल्क अलंकरण व ११,००० रु. की सम्मान राशि से अलंकृत किया गया। लघुकथा विधा के विकास में विशेष अवदान हेतु कांता राय भोपाल, हिंदी काव्य में अभियांत्रिक बिंबों के प्रयोग हेतु इं. राग तेलंग भोपाल , महाकुंभ प्रयाग में श्रेष्ठ रेल यातायात प्रबंधन व उत्कृष्ट लेखन के लिए बसंत शर्मा जबलपुर, हास्य-व्यंग्य साहित्य लेखन हेतु इं. राजेश अरोरा लखनऊ प्रत्येक को पाँच-पाँच हजार रुपए,
उपन्यास विधा में डॉ. वीणा सिन्हा भोपाल व किशोर शर्मा सारस्वत पंचकूला, बाल साहित्य में हेतु लाल देवेन्द्र कुमार श्रीवास्तव बस्ती तथा सुधा दुबे भोपाल, कहानी संग्रह ज्योति जिंदा है तथा अन्य कहानियाँ पर डॉ. रानी श्रीवास्तव गुड़गाँव, व्यंग्य लेखं हेतु सतीश चंद्र श्रीवास्तव भोपाल, समालोचना हेतु आलोचना का ब्राह्मणवाद पर राजा अवस्थी कटनी, गीत संग्रह ”धूप भरकर मुट्ठियों हेतु मनोज जैन मधुर भोपाल, यात्रा संस्मरण गंध के गलियारे हेतु गोविंद ‘अनुज’ शिवपुरी प्रत्येक को २५००/-, जीवनी विज्ञ शिल्पी विश्वेश्वरैया के लिए इं. सुरेन्द्र सिंह पवार जबलपुर, काव्य संग्रह विधा में रचना उनियाल बेंगलुरु, अनुराधा गर्ग ‘दीप्ति’ कोटा व इं. राजेन्द्र शर्मा ‘राही’ ग्वालियर तथा गोंड़ी व वर्ली चित्रकला हेतु खंजन सिन्हा भोपाल प्रत्येक को ११००/- सम्मान निधि, अलंकरण पत्र, अंग वस्त्र आदि से फराह नसीम कसरगोड़ केरल, अरविंद श्रीवास्तव दतिया, शालिनी श्रीवास्तव बेंगलुरु, कालीदास ताम्रकार जबलपुर, मंजू शर्मा जोधपुर तथा रागिनी प्रसाद मुंबई को सम्मान पत्र, पुस्तकोपहार
अलंकृत किया गया।
संस्थान गत ५ दशकों से प्रति वर्ष हिंदी के कालजयी साहित्यकारों की स्मृति में अपने सदस्यों से सम्मान निधि एकत्र कर श्रेष्ठ कार्य हेतु रचनाकारों को अलंकृत करता है।

