
बापू ने खादी को देश की बैसाखी के रूप में देखा था, किंतु आज खादी स्वयं बैसाखी के सहारे चल रही है । बापू के समय के चरखा और खादी का उद्देश्य देश को गुलामी की जंजीरों से छुटकारा दिलाना तथा ईस्ट इंडिया कंपनी की विदेशी हुकूमत को उखाड़ फेंकना था। समय निकल चुका है और अब हम गुलाम नहीं है । हम लगभग 78 वर्ष पूर्व आजाद हो चुके हैं । देश की आजादी में खादी के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता । अब खादी को वर्तमान परिदृश्य में देखना होगा।
वर्तमान में खादी के माध्यम से आर्थिक संरचना को कैसे मजबूत किया जाए कैसे अधिकाधिक रोजगार के अवसर सृजित किए जाएं , इस ओर सतत कार्यवाही और समीक्षा की आवश्यकता है। बापू जी ने एक बार विनोबा से पूछा था कि तुम इतना अधिक सूत कातते हो , चरखा संघ के हिसाब से तुम्हें कितनी मजदूरी मिलेगी? बिनोवा जी ने उत्तर दिया- दो आने । बापू को बहुत दुख हुआ और कत्तिन / सूतकारों की मजदूरी बढ़ाने की सार्थक कार्यवाही उनके द्वारा की गई। खादी की महत्ता से जन-जन को परिचित कराने के लिए वह विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए कहते थे कि हमारे देश की गरीबी का भान सभी को होना चाहिए। गांव किस तरह उजड़ते चले जा रहे हैं , वह क्या चीज है जो लोगों को इस गरीबी में कुछ सहारा दे सकती है , उजड़ते हुए गांव को बचा सकती है, तभी खादी का महत्व समझ में आएगा। बापू द्वारा तत्समय व्यक्त किए गए विचार आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं । बापू ने आगे कहा था की खादी पुराने उद्योग को पुनर्जीवित करती है । यह यंत्रों को नष्ट नहीं करती, नियंत्रित अवश्य करती है । चरखा भी तो स्वयं एक छोटा सा सुंदर यंत्र है। यह गांव में ही और वह भी अपने घर में रोजगार प्रदान करता है। गांव मजबूत होंगे, परिणामतः प्रदेश और देश मजबूत होगा । खेती के साथ-साथ खादी और ग्राम उद्योग, ग्रामदेवता की आर्थिक स्थिति मजबूत करेंगे , देश खुशहाल होगा। पवनार में संत विनोबा जी के समय में विचार मंथन चलता था कि खादी की गुणवत्ता कैसे बढ़ाई जाए, सूतकारों की आमदनी में वृद्धि कैसे हो? निर्णय हुआ कि पोनी बनाने तक की प्रक्रिया का मशीनीकरण कर देना चाहिए। पोनी सामान बनेगी तो धागा समान बनेगा। खादी की गुणवत्ता मैं सुधार होगा , चरखे पर धागा बार-बार टूटेगा नहीं। फलस्वरुप सूतकार की आमदनी भी बढ़ेगी । निर्णय का पालन हुआ और जगह-जगह खादी के बड़े केद्रों पर पोनी बनाने के लिए मिल मशीनरी लगा दी गई । पोनी का निर्माण मशीन से होने लगा। सूत में सुधार हुआ और खादी की समानता में सुधार आया। किंतु आज विनोबा जी का अभाव खादी में खटक रहा है। बढ़ती महंगाई और पाश्चात्य संस्कृति के मशीनरी युग में चरखे पर सूत कातकर काम करना, बुनकर के द्वारा खादी कपड़ा तैयार करने में प्राप्त श्रमकाई से उदर पोषण करना अब कठिन हो गया है । खादी की अधिक कीमत के कारण इसकी बिक्री की समस्या से खादी उत्पादन का पूरा चक्र ही धीमा हो गया है। फल स्वरुप खादी उत्पादन में गिरावट और इसके माध्यम से रोजगार के अवसरों में कमी परिलक्षित हो रही है । एक ओर बड़ी-बड़ी कंपनियां अपने ब्रांड को जग जाहिर करने में करोड़ों रुपए फूंक देती हैं, वहीं दूसरी ओर “खादी” ब्रांड जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाये बैठा है , उसकी ओर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है। खादी की तासीर को प्रचार- प्रसार के माध्यम से जन सामान्य तक ले जाने की आवश्यकता है । शुद्ध और प्रामाणित खादी बिक्री करने के लिए बड़े-बड़े शोरूम न केवल राष्ट्र के अंदर बल्कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी खोले जाने की आवश्यकता है । गांधी और खादी के नाम पर विदेश में न केवल इस वस्त्र की बिक्री बढ़ाई जा सकती है, बल्कि विदेशी मुद्रा प्राप्त करने का एक बड़ा दरवाजा खुल सकता है । यह सही है कि शासन स्तर से खादी उत्पादन एवं बिक्री के लिए विभिन्न प्रोत्साहन दिए जा रहे हैं , अनुदान दिए जा रहे हैं। इसके बाद भी जन सामान्य इसकी तासीर से परिचित नहीं हो पा रहा है। एक बार यदि खादी की तासीर जन सामान्य को समझ में आ जाती है तो फिर खादी को बैसाखी की आवश्यकता नहीं होगी । खादी की बिक्री के लिए शासन द्वारा विभिन्न प्रकार के आरक्षण, बिक्री रिबेट सुविधा दी जा रही है। यह आरक्षण हैंडलूम वस्त्र को भी दिए गए हैं। परिणामस्वरूप खादी और हैंडलूम आपस में एक दूसरे के प्रतिस्पर्धी बन गए हैं। शासकीय क्रय आदेश प्राप्त करने की इन दोनों में होड़ लगी रहती है , अर्थात यह दोनों ही शासन से प्राप्त होने वाले क्रय आदेशों पर जिंदा हैं। क्या ऐसा नहीं हो सकता कि हैंडलूम और खादी एक दूसरे के प्रतिस्पर्धी ना रहेंॽ खादी और हैंडलूम को मिलाकर एक नई नीति बनाई जानी चाहिए । खादी क्षेत्र में आधिकाधिक रोजगार चरखे के माध्यम से सूत कताई पर दिया जाता है ,जबकि हैंडलूम क्षेत्र में जो धागा प्रयोग में आता है वह मिल मेड अर्थात बड़ी मशीनरी पर तैयार होता है। यदि इन दोनों में सामंजस्य बैठाकर ऐसी नीति निर्धारित की जाए कि खादी क्षेत्र में धागा निर्मित हो और हैंडलूम क्षेत्र खादी क्षेत्र में तैयार किए गए सूत का ही प्रयोग करे तो संभवत: हैंडलूम और खादी की प्रतिस्पर्धा को समाप्त किया जा सकता है एवं बड़े पैमाने पर सूतकारों ,बुनकरों को स्थाई रोजगार सृजित हो सकता है। खादी क्षेत्र का धागा जो हैंडलूम क्षेत्र में बुनकरों द्वारा उपयोग में लाया जाएगा ऐसे वस्त्र का नाम हो सकता है-
“कंपोजिट खादी”अथवा “हेंडो खादी”। कंपोजिट खादी में खादी क्षेत्र का जो धागा उपयोग किया जाएगा वह ऐसे चरखे से निर्मित किया जाएगा जो 1/4 अश्व शक्ति की मोटर से चलता हो । समयानुसार चरखे में मोटर के उपयोग की स्वीकृति देना आज की आवश्यकता प्रतीत होती है। यह कार्य शासन स्तर का नहीं है। खादी में संलग्न संस्थाओं को इस विषय पर सामूहिक बैठक कर निर्णय लिए जाने की आवश्यकता है। नीति विषयक मामले में आजकल खादी अनाथ जैसी हो गई है , यदि गांधी या विनोबा होते तो शायद इसकी मान्यता कभी से हो गई होती। इस व्यवस्था से न केवल सूतकार की आमदनी में तीन से चार गुना वृद्धि हो सकती है बल्कि खादी के वस्त्र की कीमत भी कम होगी । मोटर चालित चरखे से निर्मित सूत में एक समानता भी बढ़ेगी , फलस्वरुप खादी की गुणवत्ता में निखार आएगा ।
(लेखक खादी विशेषज्ञ रहे हैं)
डॉ अशोक कुमार धमेंनियां ‘अशोक’


