श्री परम शक्ति ज्योतिष परामर्श केंद्र ईदगाह हिल्स भोपाल, मध्य प्रदेश
ज्योतिषाचार्य, पंडित गंगा प्रसाद आचार्य ज्योतिष,
नक्षत्र शब्द विशेष रूप से वैदिक ज्योतिष में चंद्र भाग का प्रतिनिधित्व करता है। भारतीय ज्योतिष के अनुसार राशि चक्र में कुल 360 डिग्री का समावेश है। इसमें विशेष रूप से 27 नक्षत्र मँडल या नक्षत्र है। इस प्रकार प्रत्येक नक्षत्र 13 डिग्री और 20 मिनट का होता है, इसके बाद प्रत्येक नक्षत्र को 4,चरण या पाद ,में समान रूप से विभाजित किया जाता है।ये, सभी 27 नक्षत्र मिलकर राशि चक्र के 360 डिग्री के एक चक्र को पूरा करते हैं।
एक या एक से अधिक तारा सितारों के समूह को नक्षत्र कहा जाता है। भारतीय ज्योतिष के अनुसार प्रत्येक नक्षत्र 27 घरों में से हर एक को दर्शाता है। सभी 27 नक्षत्र के चारों ओर चक्कर लगाने में चंद्रमा को कुल, 27 दिन लगते हैं। सूर्य ज्योतिषीय संकेतोँ का स्वामी है, एवँ,चंद्रमा नक्षत्रोँ, का स्वामी,है।
अश्विनी नक्षत्र से लेकर रेवती नक्षत्र तक संख्या, 27 होती है।
जन्म पत्रिका में नक्षत्र महत्वपूर्ण होते हैं लेकिन उसमे, भी जिस नक्षत्र में ग्रह बैठे,हो, वह नक्षत्र ज्योतिष और जन्म पत्रिका दोनों में सबसे अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है। चंद्रमा, जिस ,भी,नक्षत्र में बैठा हो उस, नक्षत्र के हिसाब से व्यक्ति का स्वभाव और गुण बनते हैं। चंद्रमा अच्छे नक्षत्र ,मे,हो तो जातक को उसका शुभ फल प्राप्त होता है। लेकिन अगर गंड मूल जैसे नक्षत्र में होने पर अधिक तकलीफों का सामना जातक को करना पड़ता है।
शुभ नक्षत्र मे, इस तरह के नक्षत्र समाहित होते हैं जो कि अच्छे गुण और तत्व वाले हो,व, उनका स्वामी कोई शुभ ग्रह,हो, शुभ नक्षत्र की विशेष बात यह है कि उनमें किए गए कार्य आसानी से लाभ देते हैं। शुभ नक्षत्र , रोहिणी अश्वनी मृगशिरा पुष्य हस्त चित्रा रेवती, श्रवण स्वाति, अनुराधा उत्तरा भाद्रपद उत्तराषढा, उत्तरा फाल्गुनी धनिष्ठा पुनर्वसु शुभ नक्षत्र में गिने जाते हैं।ये, सभी इस प्रकार के नक्षत्र हैं जिसमें कार्य की सफल होने की संभावना अधिक होती है।
अशुभ,नक्षत्र, पूर्वा फाल्गुनी पूर्वाषाढा, पूर्वाभाद्रपद, विशाखा जेष्ठा, आर्दा, मूल और शतभिषा, इन नक्षत्र में किए गए कार्य अच्छे से सफल नहीं हो सकते हैं।
मध्यम नक्षत्र, भरणी कृतिका मघा, और अश्लेषा को मध्यम, नक्षत्र की श्रेणी में माना जाता है कुछ विशेष कार्य करने के लिए इन नक्षत्रों का प्रयोग किया जाता है। इन नक्षत्रोँ, में शुभ कार्य नहीं किए जाते,है।
प्रत्येक नक्षत्र में तारों की संख्या अलग-अलग होती है एवं आकृति भी नक्षत्र की भिन्न,2, होती है। प्रत्येक नक्षत्र का ग्रह स्वामी, एवं देवता भी अलग-अलग होते हैं।
अश्विनी नक्षत्र तीन तारों के समूह से मिलकर बना, है। इसकी आकृति अश्वमुख की भांति प्रतीत होती है।
इसका स्वामी ग्रह केतु है।
अश्विनी नक्षत्र के देवता अश्विनी कुमार,है।
यह नक्षत्र चक्र का पहला नक्षत्र है।
इस नक्षत्र में तारों की संख्या तीन है।
यह नक्षत्र मेष राशि में स्थित है।
भरणी नक्षत्र तीन तारों के समूह से बना हुआ है। इसकी आकृति में अलग-अलग विद्वानों के मत है, कुछ विद्वान,भग, यानी योनि, जैसी आकृति मानते हैं तो कुछ विद्वान,मक्षिका, जैसी आकृति मानते हैं।
यह तीनों सितारों के माध्यम से त्रिभुज जैसी आकृति बनती है।
नक्षत्र का ग्रह स्वामी शुक्र।
इसके देवता यम,है।
यह नक्षत्र चक्र में दूसरा नक्षत्र है।
यह नक्षत्र मेष राशि में स्थित है।
कृतिका नक्षत्र, इस नक्षत्र का किसान सबसे अधिक उपयोग करते हैं।
विद्वान लोगों का मत है कि कृतिका नक्षत्र की आकृति छूरे,जैसी है।
इस नक्षत्र का ग्रह स्वामी सूर्य,है।
इसके देवता अग्नि,है।
यह सात तारों का समूह है।
यह अंगूर के गुच्छा जैसा प्रतीत होता है।
इसका प्रथम चरण मेष राशि में और शेष तीन चरण वृषभ राशि में होते हैं।
यह नक्षत्र चक्र का तीसरा नक्षत्र है।
रोहिणी नक्षत्र आकृति रथ के समान होती है। रोहिणी नक्षत्र के साथ अन्य अश्विनी भरणी कृतिका नक्षत्र को मिला दिया जाए तो इससे एक अर्धचंद्र की आकृति बनती है।
रोहिणी के चारों की गिनती आकाश में दृष्ट तारों में से सबसे अधिक प्रकाशमान 20 तारों में होती है।
यह चंद्रमा को सबसे अधिक प्रिय माना जाता है जिसकी वजह से उन्हें शाप भी मिला है।
इस नक्षत्र का स्वामी ग्रह चंद्रमा, देवता ब्रह्मा।
पांच तारों के कारण आकृति एक रथ जैसी लगती है।
यह संपूर्ण नक्षत्र वृषभ राशि में स्थित है।
यह नक्षत्र चक्र का चौथा नक्षत्र है।
मृगशिरा नक्षत्र, नक्षत्र मंडल में सबसे ऊपरी भाग में दिखने वाला एवं अपने तारों से त्रिभुज की आकृति बनाने वाला नक्षत्र है। इस नक्षत्र में तीन तारे होते हैं। इस, नक्षत्र के दो चरण वृषभ राशि में होते हैं और अन्य दो चरण मिथुन राशि में होते हैं यह नक्षत्र चक्र का पांचवा नक्षत्र है।
ग्रह स्वामी मंगल, है।
चंद्रमा का अधिकार है इस नक्षत्र पर।
आर्दा नक्षत्र, यह
एकल, तारा नक्षत्र है, इसमें सिर्फ एक ही सितारा है। यह उन बीस सितारों में शामिल होता है जो, आकाश मंडल में सर्वाधिक चमकीले तारे हैं। यह संपूर्ण नक्षत्र मिथुन राशि में समाहित होता है। सूर्य 21 जून से आद्रा नक्षत् में प्रवेश करता है। यह नक्षत्र चक्र का छठ नक्षत्र है, इसके स्वामी ग्रह राहु है एवं देवता शिव है।
यह संपूर्ण नक्षत्र मिथुन राशि में समाहित है।
पुनर्वसु नक्षत्र पुरुष और प्रकृति के रूप दो, तारों के द्वारा यह नक्षत्र बनता है इसके प्रथम तीन चरण मिथुन राशि में और आखिरी चरण कर्क राशि में होता है। इसके दो तारे मिथुन राशि के चिन्ह़ोँ, के दो बच्चों को दर्शाता है। इस नक्षत्र को बहुत ही शुभ माना जाता है इसका अर्थ होता है कि फिर से प्रकाशित होना, या फिर से धनी होना। यह नक्षत्र चक्र का सातवां नक्षत्र है इसके ग्रह स्वामी गुरु है और देवता भगवान आदित्य है।
पुष्य नक्षत्र, तीन तारों के समूह से बना है। इन तारों की वजह से पुष्य नक्षत्र की आकृति एक तीर के जैसी बनती है। वेदों में भी इस,नक्षत्र को काफी शुभ एवं मांगलिक कहा गया है। ऋग्वेद में पुष्य नक्षत्र को,तिष्य, के नाम से जाना जाता है। यह नक्षत्र पूर्ण रूप से कर्क राशि में स्थित है नक्षत्र चक्र का आठवां नक्षत्र है। इसके ग्रह स्वामी शनि एवं देवता बृहस्पति,है।
आश्लेषा नक्षत्र, यह पांच तारों के समूह के द्वारा बना हुआ है लेकिन इसमें भी मतभेद है कुछ विद्वान 6 तारों के समूह को मानते हैं। इसकी आकृति चक्राकार होती है। इस,नक्षत्र, को वासुकी नाग का सर माना जाता है। यह पूरा नक्षत्र कर्क राशि में स्थित है यह नक्षत्र चक्र का नौवाँ नक्षत्र है।
इसके ग्रह स्वामी,बुध, एवं देवता नाग है।
यह पूरा नक्षत्र कर्क राशि में स्थित है।
शेष आगामी समय पर।
पंडित गंगा प्रसाद आचार्य
धर्माधिकारी अखिल भारतवर्षीय धर्म संघ शाखा मध्य प्रदेश।
