अध्यात्ममध्य प्रदेश

श्रवण,मनन एवं निदिध्यासन से ही परम सत्य का प्रत्यक्ष अनुभव संभव: स्वामी चिदानंद पुरी

आचार्य शंकर सांस्कृतिक एकता न्यास द्वारा व्याख्यानमाला संपन्न

भोपाल। उपनिषदों में निहित अद्वैत सिद्धान्त को साधारण जनमानस तक पहुँचाने वाले आचार्य शंकर की परम्परा को अक्षुण्ण रखने के लिये आचार्य शंकर सांस्कृतिक एकता न्यास, संस्कृति विभाग, मध्यप्रदेश शासन द्वारा पिछले 6 वर्षों से प्रतिमाह निरंतर शंकर व्याख्यानमाला का आयोजन किया जाता है। मार्च माह में न्यास द्वारा आज 89 वीं व्याख्यानमाला का आयोजन मंगलवार को ऑनलाइन किया गया , जिसमें अद्वैताश्रम के अध्यक्ष स्वामी चिदानंद पुरी ने वेदांत के अत्यंत महत्त्वपूर्ण विषय “अध्यारोप -अपवाद” पर ज्ञानवर्धक व्याख्यान दिया, जिससे श्रोता भारतीय दर्शन की गहराइयों से परिचित हुए । उन्होंने अपने प्रवचन की शुरुआत वेदांत के मूल अर्थ को स्पष्ट करते हुए की। उन्होंने बताया कि ‘वेद’ का अर्थ ज्ञान और वेदांत वह सर्वोच्च ज्ञान है जहाँ सभी भेद और सीमाएँ समाप्त हो जाती हैं। यह भौतिक संसार का नहीं, बल्कि आत्मा और उस परम सत्ता का ज्ञान है जिसके कारण सम्पूर्ण सृष्टि विद्यमान है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि परम सत्य को शब्दों, मन या इंद्रियों से पूर्णतः व्यक्त नहीं किया जा सकता। फिर भी ऋषियों ने असीम करुणा से इस ज्ञान को गुरु-शिष्य परंपरा (संप्रदाय) के माध्यम से पीढ़ी-दर-पीढ़ी प्रवाहित किया।अध्यारोप में गुरु साधक की भूमिका से आरंभ करते हुए इस द्वैत संसार को यथार्थ के रूप में स्वीकार करते हैं और परम सत्य पर इस सृष्टि के नाम, रूप एवं गुणों को अस्थायी रूप से आरोपित करते हैं। इसके पश्चात अपवाद में गुरु क्रमशः उन सभी आरोपित गुणों का खंडन करते हैं। उपनिषदों के “नेति, नेति” सिद्धांत के अनुसार यह दर्शाया जाता है कि परम सत्य नाम, रूप, जन्म और मृत्यु से सर्वथा परे है — वह शाश्वत और अपरिवर्तनीय है। स्वामी जी ने यह भी स्पष्ट किया की पहले द्वैत को स्वीकार किया जाता है, फिर ज्ञान के माध्यम से यह सिद्ध किया जाता है कि वास्तव में दो नहीं, केवल एक ही परम सत्ता है। यही अद्वैत है।
अंत में स्वामी जी ने ज्ञान प्राप्ति के तीन मार्ग बताए — श्रवण (गुरु-वचन सुनना), मनन (तार्किक चिंतन) और निदिध्यासन (गहन ध्यान)। इन तीनों के माध्यम से ही परम सत्य का प्रत्यक्ष अनुभव संभव है।
यह प्रवचन जिज्ञासु साधकों, विद्यार्थियों और आध्यात्मिक मार्ग पर चलने वाले प्रत्येक व्यक्ति के लिए अत्यंत प्रेरणादायक एवं मार्गदर्शक रहा। स्वामी चिदानन्द पुरी वेदान्त के प्रतिष्ठित आचार्य, ओजस्वी वक्ता, लेखक एवं समाज सुधारक हैं। आप ‘श्री शंकर चैरिटेबल ट्रस्ट’ के संस्थापक एवं प्रबंध न्यासी हैं। इस ट्रस्ट के तत्वावधान में केरल के विभिन्न क्षेत्रों में कई आश्रम संचालित हो रहे हैं, जो वेदान्त के गहन अध्ययन, सनातन धर्म के प्रसार और लोक-कल्याणकारी सेवा कार्यों के प्रमुख केंद्र हैं। उन्होंने सन् 1989 में महाशिवरात्रि के पावन पर्व पर कैलाश आश्रम, ऋषिकेश के 10वें आचार्य स्वामी विद्यानन्द गिरि जी से संन्यास दीक्षा ग्रहण की। सन् 1992 में, आपके द्वारा केरल के कोझिकोड जिले के कोलाथुर ग्राम में ‘अद्वैताश्रम’ की स्थापना की। अद्वैताश्रम के लिए भूमि स्वामी मंगलास्सेरी नारायण द्वारा दान में दी गई थी। स्वामी जी अद्वैताश्रम के प्रमुख के रूप में मार्गदर्शन कर रहे हैं। साथ ही, वे ‘श्री वल्लोरक्कावु क्षेत्र समिति’ के संरक्षक भी हैं। स्वामी जी आचार्य शंकर सांस्कृतिक एकता न्यास, मध्यप्रदेश शासन, संस्कृति विभाग के न्यासी है। ज्ञात हो कि न्यास द्वारा पिछले 6 वर्षों से अधिक समय से निरंतर विविध विषयों पर व्याख्यानमाला का आयोजन किया जा रहा है, जिसके माध्यम से देशभर के लाखों श्रोता जुड़े हैं। इसके अतिरिक्त न्यास द्वारा ओंकारेश्वर में एकात्मता का वैश्विक केंद्र – ‘एकात्म धाम’ विकसित किया जा रहा है, जिसके अंतर्गत 108 फीट ऊंची आदि शंकराचार्य जी की ‘एकात्मता की प्रतिमा’ मान्धाता पर्वत पर स्थापित की गई। इससे अतिरिक्त अद्वैत लोक – संग्रहालय तथा आचार्य शंकर अंतरराष्ट्रीय अद्वैत वेदांत संस्थान की भी स्थापना की जा रही है।

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