जल संरक्षण के लिए जन भागीदारी आवश्यक : मुख्यमंत्री डॉ.मोहन यादव
नर्मदा मिशन परिवार द्वारा रवीन्द्र भवन भोपाल में 'नर्मदा चिंतन' बौद्धिक संगोष्ठी का आयोजन आज, मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव संग दादागुरू हुए शामिल


भोपाल, मई 15। नर्मदा मिशन परिवार द्वारा रवीन्द्र भवन, भोपाल में ‘नर्मदा चिंतन’ बौद्धिक संगोष्ठी का आयोजन अवधूत सिद्ध महायोगी श्री दादागुरु भगवान, मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव सहित पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री प्रहलाद पटेल, खेल एवं युवा कल्याण, सहकारिता मंत्री विश्वास सारंग, मप्र जनअभियान परिषद के उपाध्याय पद्मश्री मोहन नागर एवं पर्यावरण संरक्षक गतिविधि के अखिल भारतीय संयोजक गोपाल आर्य ,राज्यसभा सांसद माया नरोलिया की उपस्थिति में हुआ।दादा गुरु ने सम्बोधित करते हुए कहा कि ‘नर्मदा चिंतन’ संगोष्ठी मात्र एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि माँ नर्मदा के प्रति हमारी सामूहिक चेतना का जागरण है, प्रकृति और संस्कृति पर केंद्रित जीवनशैली के इस विमर्श ने हम सभी को एक नई दिशा प्रदान की, हृदय को माँ नर्मदा की कल-कल बहती धारा जैसी शांति और विचारशीलता से भर दिया है। उन्होंने कहा कि भारत की शक्ति नर्मदा -गंगा है। नर्मदा परिक्रमा पथ युग निर्माण, चरित्र निर्माण का पथ है। हमारे यहाँ सभी सभ्यताओं, संस्कृति एवं कलाओं का जन्म नदियों किनारे हुआ है, नदी हमारे लिए माँ है, शक्ति है। यह भारत ही नहीं विश्व के लिए धरोहर है। नर्मदा के दर्शन मात्र से हमारा कल्याण हो जाता है।
मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव ने कहा कि जब तक उस परमपिता परमेश्वर की विशेष कृपा न हो, तब तक दादागुरु जैसे सिद्ध संतों के दर्शन और उनकी शरण प्राप्त नहीं होती। आज हम पुण्यसलिला मां नर्मदा के चिंतन के साथ-साथ समाज के 9कर्मयोगियों का सम्मान कर रहे हैं। अपना जीवन तो सब जीते हैं, लेकिन दूसरों के लिए जीना ही सच्ची नारायण सेवा है। आप सभी को बहुत-बहुत बधाई। मां नर्मदा की सेवा और संरक्षण के प्रति दादागुरु जी का अटूट संकल्प हमारे लिए पथ-प्रदर्शक है। चार बार निराहार परिक्रमा करना सामान्य देह से संभव नहीं, यह केवल योगबल और अटूट श्रद्धा से संभव है।. ‘नर्मदा मिशन’ के माध्यम से संस्कृति, धर्म, धरा, धेनु और पर्यावरण को बचाने का जो कार्य आप कर रहे हैं, वह हम सबके लिए एक उदाहरण है। मैं आपके तप और संकल्प को प्रणाम करता हूं। जिस पर नर्मदा मइया का अखंड आशीष हो, वही ऐसी तपस्या कर सकता है।
सनातन संस्कृति में प्रकृति उपभोग की नहीं उपासना का आधार-
सनातन संस्कृति में प्रकृति को परमात्मा माना गया है।हमारी जीवनशैली हमेशा से प्रकृति-प्रधान रही है। जल, जंगल, नदियां, पहाड़ को हम सिर्फ संसाधन नहीं मानते बल्कि माता-पिता और पूर्वज मानकर पूजते हैं।
दुनिया आज जिस क्लाइमेट चेंज का समाधान ढूंढ रही है, वह हमारे दर्शन में पहले से मौजूद है। हमारी संस्कृति ने हमें सिखाया है- माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः यानी यह भूमि मेरी माता है और मैं इसका पुत्र हूं।
हमारे यहां कहा जाता है- एक बावड़ी 10 कुओं के बराबर होती है, 10 बावड़ियों के बराबर एक तालाब, 10 तालाबों के बराबर एक पुत्र और 10 पुत्रों के बराबर एक वृक्ष होता है।आज पूरी मानवता पर्यावरण के संकट से जूझ रही है, लेकिन दुनिया जिस संकट का हल ढूंढ रही है, वह समाधान हमारी सनातन संस्कृति में पहले से मौजूद है। हमारे शास्त्र हमें सिखाते हैं त्याग के साथ भोग करो।
मनुष्य और प्रकृति एक दूसरे के अस्तित्व का हिस्सा हैं।वृक्षों, नदियों, पहाड़ों, भूमि, जल से हमारा नाता है। इस नाते प्रकृति संरक्षण का संकल्प हमारा दायित्व है। मुझे गर्व है यह कहते हुए कि प्रधानमंत्री जी के नेतृत्व में दुनिया पर्यावरण संरक्षण को लेकर जागरूक हो रही है। मोदी जी ने कई वैश्विक मंचों पर प्रकृति के अनुरूप जीवनशैली अपनाने पर जोर दिया है।इस अवसर पर वरिष्ठ चिकित्सक एवं पूर्व कुलपति डॉ रविशंकर शर्मा ‘अवधूत सिद्ध महायोगी पूज्य दादागुरु भगवान : चिकित्सा विज्ञान के लिए चुनौति’ विषय पर अपनी बात रखी।इनका हुआ सम्मान : कार्यक्रम में नर्मदा समर्थ अलंकरण से लहरी बाई, डॉ रविशंकर शर्मा, डॉ साविता दीक्षित, संध्या सोहनी, शैलेन्द्र कुमार उपाध्याय रविशंकर रजक, मानसिंह गुर्जर, सेवकराम मरावी, मिता वाधवा एवं विक्रम लोधी को सम्मानित किया गया।
संगोष्ठी में प्रकृति एवं संस्कृति पर केन्द्रित जीवनशैली को बढ़ावा देने के उद्देश्य से वैश्विक संकट, चुनौतियां और प्रकृति-प्रधान भारतीय सनातन संस्कृति पर विशेष चिंतन हुआ ।कार्यक्रम का संचालन भक्ति शर्मा, डॉ.शुभम चौहान एवं आभार डॉ प्रिया भावे चित्तावर ने किया।


