“माँ तुझे प्रणाम” काव्य गोष्ठी में गूँजी मातृत्व, संवेदना और भारतीय संस्कृति की स्वर लहरियाँ



भोपाल, 17 मई 2026। अखिल भारतीय संस्था कला मंदिर द्वारा ग्रीष्मकालीन साहित्यिक गोष्ठियों की श्रृंखला के अंतर्गत मातृ दिवस के उपलक्ष्य में एक शाम माँ के नाम “माँ तुझे प्रणाम” विषय पर एक भव्य काव्य गोष्ठी एवं साहित्यिक आयोजन रविवार सायंकाल विश्व संवाद केंद्र, भोपाल में अत्यंत गरिमामय वातावरण में सम्पन्न हुआ। कार्यक्रम में माँ की ममता, त्याग, करुणा, संस्कार, भारतीय संस्कृति एवं पारिवारिक मूल्यों पर आधारित कविताओं, गीतों, ग़ज़लों एवं मुक्तकों की भावधारा निरंतर प्रवाहित होती रही। संपूर्ण सभागार साहित्य और संवेदनाओं के मधुर वातावरण से सराबोर रहा।कार्यक्रम की अध्यक्षता अखिल भारतीय संस्था कला मंदिर के राष्ट्रीय अध्यक्ष *डॉ. गौरीशंकर शर्मा ‘गौरीश’* ने की। मुख्य अतिथि के रूप में वरिष्ठ गीतकार *श्री यतीन्द्रनाथ ‘राही’विशिष्ट अतिथि के रूप में शिक्षाविद **डॉ. उषा खरे, सारस्वत अतिथि के रूप में सुप्रसिद्ध साहित्यकार **डॉ. ममता वाजपेयी* ने अपनी गरिमामयी उपस्थिति प्रदान की।
इसके अतिरिक्त संस्था के कार्यकारी अध्यक्ष हरिवल्लभ शर्मा ‘हरि’, उपाध्यक्ष **चौ. मदनमोहन ‘समर’, उपाध्यक्ष **डॉ. प्रभात पाण्डेय, सचिव ** व्ही. के. श्रीवास्तव* सहित अनेक वरिष्ठ साहित्यकार, कवि, बुद्धिजीवी एवं साहित्यप्रेमी बड़ी संख्या में उपस्थित रहे। कार्यक्रम का शुभारंभ माँ सरस्वती के चित्र पर माल्यार्पण एवं दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ। तत्पश्चात अतिथियों का स्वागत पुष्पगुच्छ एवं साहित्यिक अभिनंदन द्वारा किया गया। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में *डॉ. गौरीशंकर शर्मा ‘गौरीश’* ने कहा कि भारतीय संस्कृति में माँ को देवत्व का स्थान प्राप्त है। माँ केवल जन्म देने वाली शक्ति नहीं, बल्कि जीवन के प्रत्येक संस्कार की प्रथम गुरु है। उन्होंने कहा कि आधुनिकता की दौड़ में यदि मनुष्य अपने संस्कारों से दूर हो रहा है, तो साहित्य का दायित्व है कि वह समाज को पुनः संवेदनाओं और पारिवारिक मूल्यों से जोड़ने का कार्य करे। मातृत्व मानवता की सबसे पवित्र अनुभूति है और साहित्य सदैव इस भावभूमि को समृद्ध करता आया है। आपने दोहों में “ माँ तुझे प्रणाम..”और गीत के माध्यम से माँ के महत्व पर प्रकाश डाला, डॉ रामवल्लभ आचार्य जी द्वारा लिखित कलामन्दिर गान का वाचन भी किया। मुख्य अतिथि यतीन्द्रनाथ ‘राही’* ने अपने संबोधन में कहा कि माँ पर जितना लिखा जाए, वह कम है। माँ त्याग, तपस्या और निस्वार्थ प्रेम की प्रतिमूर्ति होती है। भारतीय काव्य परंपरा में माँ को धरती, गंगा और संस्कृति के रूप में देखा गया है। उन्होंने उपस्थित रचनाकारों की सराहना करते हुए कहा कि ऐसी साहित्यिक गोष्ठियाँ समाज में संवेदनशीलता और संस्कारों के संरक्षण का महत्वपूर्ण कार्य करती हैं। उन्होंने माँ पर एक श्रेष्ठ रचना का पाठ भी किया। शिक्षाविद *डॉ. उषा खरे* ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि माँ ही बच्चे की प्रथम शिक्षिका होती है। बालक के व्यक्तित्व निर्माण, नैतिकता और संस्कारों की नींव माँ के सान्निध्य में ही रखी जाती है। शिक्षा केवल पुस्तकों तक सीमित नहीं है, बल्कि जीवन मूल्यों का संचार भी उतना ही आवश्यक है और यह कार्य सर्वप्रथम माँ ही करती है। मां पर सुन्दर रचना भी प्रस्तुत की।
सारस्वत अतिथि *डॉ. ममता वाजपेयी* ने कहा कि माँ केवल एक शब्द नहीं, बल्कि सम्पूर्ण सृष्टि की करुणा और प्रेम का विस्तार है। साहित्य में माँ की उपस्थिति सदैव मनुष्य को मानवीय बनाए रखने की प्रेरणा देती है। उन्होंने आयोजन की सराहना करते हुए कहा कि ऐसे कार्यक्रम समाज में संवेदना और सांस्कृतिक चेतना को जीवित रखते हैं। उन्होंने एक सुन्दर सस्वर गीत भी पढा।
कार्यक्रम में कवियों एवं साहित्यकारों ने माँ की ममता, संघर्ष, त्याग, वात्सल्य एवं भारतीय संस्कृति पर केन्द्रित भावपूर्ण रचनाओं का काव्यपाठ किया। *सीमा हरि शर्मा* ने अपनी प्रस्तुति में कहा— “यदि कोई प्रश्न पूछे किसी से भी ऐसा कौन है, जो अगले जन्म में भी चाहिए, तो उत्तर होगा — वही माँ।” *सुषमा श्रीवास्तव* ने भावपूर्ण पंक्तियाँ प्रस्तुत कीं— “माँ जैसा कोई नहीं, माँ तू बड़ी महान, इसकी ममता-करुणा ने पाला सकल जहान।” *डॉ. प्रियंका श्रीवास्तव* ने जीवन संघर्षों के बीच माँ की स्मृतियों को स्वर देते हुए कहा— “दुर्लभ कठिन जंजालों में, कंटीले से झाड़ों में, तुम नहीं हो माँ, पर याद साथ है।”*ज्योत्स्ना खोले* ने मधुर भावों में कहा— “माँ तुम कितनी प्यारी हो, दुनिया से भी न्यारी हो, तुम हम सबकी माली हो।” *आदित्य हरि गुप्ता* ने माँ की ममता का चित्र खींचते हुए कहा— “माँ तेरा आँचल फैला है, देख रहा हूँ; माँ की ममता सुखदाई है, सोच रहा हूँ।”*गोहिया जी* ने श्रद्धा स्वर में प्रस्तुत किया— “जीवन की करती रखवाली, धन्य-धन्य माँ शेरावाली।” *अशोक व्यास* ने माँ के निस्वार्थ स्नेह को शब्द देते हुए कहा— “माँ तुम तो बस ‘हाँ’ कहती हो, कुछ भी माँगो, तुम्हारे मुख से कभी ‘ना’ नहीं निकलती।” *सुरेश पटवा* ने कहा— “जब बचपन में माँ होती है, हर धड़कन में जान होती है।”
*कैलाश मेश्राम* ने अत्यंत मार्मिक पंक्तियाँ सुनाईं— “तुम मेरा मन देखो, तस्वीर तुम्हारी है; बस तन भर मेरा है, साँसें तो तुम्हारी हैं।”
*राजेन्द्र शर्मा ‘राही’* ने माँ की महिमा का वर्णन करते हुए कहा— “माँ तेरी गौरव गाथा को कंठ नहीं गा सकता है, तेरी पदवी इतनी पावन, रूप प्रभु सा लगता है।”
*अरविंद मिश्रा* ने कहा— “उम्मीदों के समुद्र में शांत लहर-सी बनी रहती हो माँ।”
वहीं *अनीता तिवारी* ने माँ को गंगा की पवित्रता से जोड़ते हुए भावपूर्ण रचना प्रस्तुत की— “माँ गंगा-सी पावन होती है।”
संस्था के कोषाध्यक्ष श्री के के श्रीवास्तव ने मां पर एक सुन्दर ग़ज़ल का पाठ किया।
महासचिव *श्री व्ही. के.श्रीवास्तव ने मां और पारिवारिक संतुलन पर श्रेष्ठ कविता पढ़ी
संस्था के उपाध्यक्ष श्री प्रभात पाण्डेय ने माँ के ऊपर एक सुन्दर रचना का पाठ किया, उपाध्यक्ष चौ. मदनमोहन ‘समर ने अपनी माँ केअस्थि कलश को गंगा जी में विसर्जित करते समय क्या क्या नहीं विसर्जित किया, एक भावपूर्ण मार्मिक गीत पढ़ा।
संस्था के कार्यकारी अध्यक्ष *श्री हरिवल्लभ शर्मा ‘हरि’* ने कार्यक्रम की रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए कहा कि कला मंदिर निरंतर साहित्य, संस्कृति और सामाजिक सरोकारों से जुड़े आयोजनों के माध्यम से समाज में सकारात्मक चेतना जागृत करने का कार्य कर रहा है। एक ग़ज़ल “ है कौन तीनों लोक में तेरे समान माँ, तुझसे बडा है कौन जहां में महान माँ’ का पाठ किया और कार्यक्रम के अंत में सभी उपस्थित जनों का आभार भी प्रकट किया।
काव्यपाठ के दौरान अनेक अवसरों पर श्रोता भावुक हो उठे और सभागार तालियों की गड़गड़ाहट से गूँजता रहा। कई रचनाओं में माँ को भगवान से भी श्रेष्ठ बताया गया, तो कुछ कविताओं में वृद्धावस्था में माँ की उपेक्षा जैसे सामाजिक विषयों को अत्यंत मार्मिकता के साथ प्रस्तुत किया गया।
अंत में ने सभी अतिथियों, साहित्यकारों एवं उपस्थित नागरिकों के प्रति आभार व्यक्त किया।



