संपादकीय

युवा बेचैनी शहरों के लिए चेतावनी है

रोजगार, कौशल, संवाद और जीवन-गुणवत्ता को शहरों की योजना का केंद्र बनाना होगा

मनोज मीक
अर्बन डेवलपमेंट कॉलमिस्ट

हाल के दिनों में “कॉकरोच जनता पार्टी” जैसी डिजिटल चर्चा देश के युवा मन की बेचैनी को सामने ला रही है। इसे किसी दल, मंच या वायरल ट्रेंड तक सीमित करके नहीं देखा जाना चाहिए। यह संकेत है कि युवा रोजगार, महंगाई, परीक्षाओं, कौशल, प्रतिनिधित्व और सम्मानजनक संवाद को लेकर भीतर से दबाव महसूस कर रहा है। रिपोर्टों के अनुसार कुछ ही दिनों में इस डिजिटल पहल से लाखों युवा जुड़े और इसका असर राष्ट्रीय चर्चा तक पहुँचा। यह संख्या चाहे बदलती रहे, पर संदेश स्पष्ट है युवा सुना जाना चाहता है। वह व्यंग्य, मीम और डिजिटल भाषा में वही बात कह रहा है, जिसे नीति, समाज और शहरों को गंभीरता से सुनना चाहिए।

शहरी विकास के संदर्भ में यह विषय और भी महत्वपूर्ण है। आज शहरों की जिम्मेदारी केवल सड़क, भवन, फ्लाईओवर और निवेश तक सीमित नहीं रह गई है। शहरों को युवाओं के लिए रोजगार, कौशल, किफायती आवास, सुरक्षित सार्वजनिक स्थान, बेहतर परिवहन, खेल-संस्कृति के अवसर, स्टार्टअप माहौल, मानसिक स्वास्थ्य समर्थन और संवाद की जगह भी देनी होगी।

भारत की युवा पीढ़ी उन शहरों की ओर देख रही है, जहाँ उसे काम के साथ गरिमा, अवसर के साथ भरोसा, और विकास के साथ जीवन-गुणवत्ता मिले। आने वाले समय में वही शहर आगे बढ़ेंगे, जो युवा को केवल श्रमशक्ति नहीं, बल्कि नागरिक, निर्माता और भागीदार मानेंगे। शहरों को अब युवा नीति, कौशल नीति और शहरी नियोजन को अलग-अलग विषय मानने की जगह एक साथ देखना होगा। हर बड़े शहर में युवा संवाद मंच, स्किल-टू-जॉब सेंटर, स्टार्टअप सहायता, किफायती किराये के आवास, सुरक्षित नाइट मोबिलिटी, खुले सांस्कृतिक स्थल और डिजिटल शिकायत-समाधान जैसे तंत्र विकसित होने चाहिए।

यह समय युवाओं पर टिप्पणी करने का नहीं, युवाओं के लिए बेहतर शहर बनाने का है। यदि भारत को भविष्य की अर्थव्यवस्था बनानी है, तो उसके शहरों को पहले युवा मन का भरोसा जीतना होगा। युवा को खारिज करने से ऊर्जा भटकती है। युवा को सुनने, सम्मान देने और दिशा देने से वही ऊर्जा राष्ट्र-निर्माण बनती है।

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