खबरसंपादकीय

चुनाव: मोदी-शाह की जोड़ी का तोड़ नहीं

बदल जाएगी राष्ट्रीय राजनीति - राजनीतिक हाशिए पर आ गए विपक्षी नेता


— मुस्ताअली बोहरा
अधिवक्ता एवं लेखक
भोपाल. पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव और उसके नतीजों ने भारतीय राजनीति की तस्वीर ही बदल दी है। मोदी-शाह की जोड़ी ने फिर ये साबित कर दिया किया कि इनसे पार पाना आसान नहीं होगा। हालांकि, पश्चिम बंगाल में बीजेपी की जीत के बाद वोट चोरी, चुनाव चोरी, फर्जी वोटिंग सहित बाहुबल और धन बल का इस्तेमाल किए जाने के आरोप-प्रत्यारोप भी सामने आ रहे हैं। जो भी हो, बंगाल फतह ने असम में बीजेपी की हैट्रिक का मजा दोगुना कर दिया है। पुडुचेरी में दूसरी बार एनडीए सरकार की आई है। बीजेपी ने अपना अगला टारगेट भी सेट कर दिया है वो है पंजाब। पश्चिम बंगाल और असम में बीजेपी की बहुमत से जीत का असर राष्ट्रीय राजनीति पर भी नजर आएगा। बंगाल की जीत ने तो ये भी जता दिया है कि मोदी-शाह की जोड़ी ही चुनावी जीत का असल मंत्र है। जिस राज्य के चुनाव में विपक्ष बिखरा हुआ होगा, एंटी इनकमबेंसी होगी, सत्ता परिवर्तन की सुगबुगाहट होगी वहां मोदी की चुनावी सभा और शाह की रणनीति निर्णायक साबित होगी। गृह मंत्री अमित शाह ने पश्चिम बंगाल की चुनावी सभा में कहा था कि बंगाल जीतने के साथ बीजेपी अपना अंग, बंग और कलिंग जीतने का लक्ष्य हासिल कर लेगी। अंग मतलब बिहार, बंग यानी बंगाल और कलिंग यानी ओडिशा। असम में सत्ता की वापसी और पश्चिम बंगाल में जीत ने बीजेपी की स्थिति को पूर्व और पूर्वोत्तर में मजबूत किया है। इस जीत से बीजेपी के एमएलए तो बढ़ेंगे ही साथ राज्यसभा में भी भाजपा सांसदों की गिनती बढ़ जाएगी। दूसरी तरफ, इन चुनावी नतीजों ने जाहिर कर दिया कि विपक्ष में एकजुटता की कमी है, वो चुनाव में कोई ऐसा मुददा नहीं खड़ा कर पाता जो मतदाताओं को रिझा सके। साथ ही बिना स्पष्ट नेतृत्व और मजबूत अजेंडा के बीजेपी का मुकाबला करना आसान नहीं है। अब, दिगर राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव और साल 2029 के लोकसभा चुनाव में इस जीत की गूंज बरकरार रहेगी।
—————- ममता ने जो बोया वही काटा —–
दास देवी का जिक्र करते हुए कहा कि आरएसएस के कुछ नेताओं से वह मिल चुकीं हैं। साल 2019 में ममता बनर्जी ने एनआरसी और सीएए की खिलाफत तो की लेकिन जब सीएए पर संसद में मतदान हुआ तो टीएमसी के आठ सांसद गैरहाजिर रहे और इस वजह से विधेयक पारित हो गया। जब बिहार में राहुल गांधी और तेजस्वी यादव की वोट अधिकार रैली निकल रही थी तब इसमें ममता बनर्जी शामिल नहीं हुईं थीं। खैर, ये बात और है कि ममता को इस बात का गुमान ही नहीं रहा होगा कि जिस भाजपा को वो सपोर्ट कर रही है एक दिन वही उसे सत्ता से बेदखल कर देगी। बीजेपी अब 2029 के लोकसभा चुनाव में पश्चिम बंगाल की सभी लोस सीटों पर जीत की कोशिश करेगी।
—— कांग्रेस, सपा, बसपा, टीएमसी सभी हुए कमजोर
सन 2021 में ममता बनर्जी नंदीग्राम सीट पर सुवेंदु से हार चुकीं थी। ममता बनर्जी अकेली ऐसी नेता बन गई हैं जो सीएम रहते हुए लगातार दूसरी बार हारीं। उधर तमिलनाडु में सीएम एमके स्टालिन को भी कोलाथुर सीट से थलपति विजय की पार्टी टीवीके के वीएस बाबू से पराजित हो गए। दिल्ली चुनाव में शीला दीक्षित तो जम्मू कश्मीर में उमर अब्दुल्ला भी अपनी सीट गंवा चुके हैं। उमर अब्दुल्ला ने सीएम रहते हुए साल 2014 में दो सीटों से चुनाव लड़ा था, मगर उन्हें सोनवार सीट से हार का सामना करना पड़ा था, बीरवाह सीट से वह जीत गए थे। दिल्ली की लगातार तीन बार सीएम रहीं शीला दीक्षित को सन 2013 में नई दिल्ली सीट पर हार का सामना करना पड़ा था। आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल ने उन्हें हराया था। उत्तराखंड के सीएम रहते हुए हरीश रावत सन 2017 विधानसभा चुनाव में हरिद्वार ग्रामीण और किच्छा दो जगह से नामांकन दाखिल किया था। हरीश रावत दोनों सीटों से हार गए थे। उत्तराखंड में सन 2022 विधानसभा चुनाव में पुष्कर सिंह धामी भी सीएम रहते हुए विधानसभा चुनाव हार गए थे। वह खटीमा से चुनाव मैदान में उतरे थे, जहां उन्हें कांग्रेस के भुवन चंद्र कापड़ी ने पराजित किया था। पंजाब के सीएम रहते हुए चरण जीत सिंह चन्नी चमकौर साहिब और भदौर दो सीटों से पर्चा भरा था लेकिन वो हार गए थे। गोवा के लक्ष्मीकांत पारसेकर साल 2017 में मांड्रेम सीट से चुनावी समर में उतरे। कांग्रेस के दयानंद सोप्ते ने उन्हें हरा दिया था। कुल मिलाकर चुनाव में यदि कोई सीएम अपनी ही सीट नहीं बचा पाए तो हैरत होना स्वाभाविक है। हालांकि, सिर्फ सीएम ही नहीं बल्कि राजनीतिक दलों के कई बड़े नेता चुनाव हारते रहे हैं फिर चाहे वो किसी राज्य में मंत्री रहे हों या केन्द्र में। इससे ये तो साबित हो जाता है कि ये जनता है….सब जानती है।
बहरहाल, अब इंडिया गठबंधन को रिफार्म करने की जरूरत है ताकि एक मजबूत विपक्ष बन सके। छोटे दलों को कांग्रेस का समर्थन करना होगा। कांग्रेस, सपा, बसपा, टीएमसी, आप, पीडीपी सहित अन्य क्षेत्रीय दलों को अपनी महत्वकांक्षा से इतर सोचना होगा। विपक्ष को चाहिए कि वो चुनावी का हार का मंथन करते हुए आगे बढ़े। अपनी गलतियों से सीख ले, जनता की बीच लगातार संपर्क बनाए रखते हुए जनहित के मुद्दों को उठाते रहे। राजनीति में सत्ता परिवर्तन कोई होना कोई नया नहीं है लेकिन जो जनविश्वास जीतेगा वही सत्ता हासिल करेगा।
— मुस्ताअली बोहरा
अधिवक्ता एवं लेखक
भोपाल

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