अध्यात्ममध्य प्रदेश

स्वामी चिन्मयानन्द जी ने अद्वैत की उज्ज्वल परंपरा को वैश्विक पटल पर प्रचारित किया : स्वामी मित्रानन्द सरस्वती

भोपाल, 20 अगस्त 2026। भारत भवन, भोपाल में आचार्य शंकर सांस्कृतिक एकता न्यास, संस्कृति विभाग, मध्य प्रदेश शासन द्वारा गुरुवार को ‘94वीं शङ्कर व्याख्यानमाला’ का आयोजन किया गया।आयोजित इस व्याख्यानमाला का आयोजन ‘चिन्मय अमृत यात्रा’ के भोपाल आगमन के शुभ अवसर पर किया गया। कार्यक्रम में स्वामी मित्रानन्द सरस्वती सहित पूज्य श्री श्री पूर्ण प्रज्ञा माँ एवं स्वामिनी सद्दावियानन्द सरस्वती ने स्वामी चिन्मयानन्द सरस्वती के जीवन, कार्य एवं अद्वैत वेदांत के प्रचार-प्रसार में उनके योगदान पर अपने विचार साझा किए।

स्वामी चिन्मयानन्द जी ने अद्वैत वेदांत को जन-जन तक पहुँचाया

स्वामी मित्रानन्द सरस्वती जी ने कहा कि 1953 में चिन्मय मिशन की स्थापना वेदांत और अद्वैत चिंतन की उज्ज्वल धरोहर को नई पीढ़ी से जोड़ने तथा उसे जन-जन तक पहुँचाने के उद्देश्य से की गई थी। उन्होंने परम पूज्य स्वामी चिन्मयानन्द सरस्वती के साथ अपने संबंधों और उनके जीवन पर गुरुदेव के प्रभाव को साझा करते हुए कहा कि वे स्वयं को अत्यंत भाग्यशाली मानते हैं कि उन्हें गुरुदेव का सान्निध्य प्राप्त हुआ।

स्वामी मित्रानन्द जी ने कहा, “मैं बहुत ही भाग्यशाली रहा कि मुझे गुरुदेव का सान्निध्य प्राप्त हुआ। मेरे माता-पिताजी गुरुदेव के शिष्य रहे हैं। उनके कार्य और जीवन से मैं इतना प्रभावित हुआ कि मैंने अपना जीवन पूज्य गुरुदेव को अर्पित कर दिया।” उन्होंने बताया कि वे स्वयं चिन्मय युवा केंद्र के सदस्य भी रहे हैं।

स्वामी मित्रानन्द ने कहा कि स्वामी चिन्मयानन्द जी ने अद्वैत वेदांत के ज्ञान को वैश्विक स्तर तक पहुँचाने के लिए अनेक ग्रंथों को सरल और सामान्य भाषा में प्रस्तुत किया। उन्होंने लगभग चार दशकों तक वेदांतिक ज्ञान-परंपरा और एकात्मता के भाव को जन-जन तक पहुँचाने के लिए अनवरत कार्य किया।

31 दिसंबर 1951 को पुणे में पहला वेदांत ज्ञान यज्ञ प्रारंभ हुआ। उस समय केवल चार लोग इसे सुनने आए, लेकिन गुरुदेव ने निराश हुए बिना 100 दिनों तक अध्ययन की कक्षा निरंतर जारी रखी। वर्ष 1952 में चेन्नई में सत्संग प्रारंभ किया गया, जहाँ प्रारंभ में उन्हें ठहरने तक की व्यवस्था उपलब्ध नहीं थी। इसके बावजूद उनका कार्य निरंतर आगे बढ़ता गया।

उन्होंने कहा कि गुरुदेव का व्यक्तित्व इतना प्रभावशाली था कि लोग उनके हास्य-विनोद, शब्दावली और सहज शैली से आकर्षित होकर आते थे और धीरे-धीरे वे वेदांत के अध्ययन से जुड़ते चले जाते थे।

स्वामी मित्रानन्द जी ने कहा कि “चिन्मय मिशन एक व्यक्ति-आधारित नहीं, बल्कि ज्ञान-आधारित संगठन है।” उन्होंने बताया कि समाज के विभिन्न वर्गों तक वेदांत का संदेश पहुँचाने के लिए बच्चों हेतु बाल विहार, युवाओं के लिए चिन्मय युवा केंद्र और महिलाओं के लिए देवी ग्रुप जैसे विभिन्न माध्यम विकसित किए गए।

गुरुदेव के वैराग्य का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि स्वामी चिन्मयानन्द जी जब कहीं से जाते थे तो पीछे मुड़कर विदाई तक नहीं देते थे। वेदांत के प्रति उनकी निष्ठा इतनी गहरी थी कि स्वास्थ्य खराब होने के बावजूद ऑक्सीजन मास्क लगाकर भी वे अध्ययन-अध्यापन करते रहे।

उन्होंने युवाओं को प्रेरित करते हुए कहा—“Give up मत करो, निष्काम कार्य करोगे तो मदद जरूर आएगा।” उन्होंने कहा कि कठिन परिस्थितियों में भी निराश हुए बिना अपने लक्ष्य की ओर निरंतर बढ़ते रहना चाहिए।

गुरुदेव के सान्निध्य ने जीवन की दिशा बदली : श्री श्री पूर्ण प्रज्ञा माँ

पूज्य श्री श्री पूर्ण प्रज्ञा माँ ने स्वामी चिन्मयानन्द जी से अपनी पहली भेंट का स्मरण करते हुए बताया कि उनकी पहली भेंट 1966 में भोपाल में हुई थी। उन्होंने तीन दिनों तक गुरुदेव को सुना और उनके विचारों एवं शिक्षाओं से अत्यंत प्रभावित हुईं। उन्होंने बताया कि उस समय वे घर जाकर अपने पिताजी को गुरुदेव से सुने हुए प्रसंग और विचार सुनाया करती थीं।

विवाह के बाद मुंबई जाने के बावजूद वेदांत का अध्ययन जारी रखा। उन्होंने स्वामी चिन्मयानन्द जी के साथ हुई अनेक मुलाकातों का स्मरण करते हुए कहा कि गुरुदेव सदैव स्नेह और आशीर्वाद प्रदान करते थे।

पूज्य माँ ने गुरुदेव के प्रसिद्ध कथन “Never Mind” का उल्लेख करते हुए कहा कि इसका भाव है—चिंता मत करो, परिस्थितियों से घबराओ मत। गुरुदेव की शिक्षाएँ जीवन में सकारात्मकता, साहस और आत्मविश्वास का संचार करती थीं।

“वेदांत किसी भी काल में पुराना नहीं होता” : स्वामिनी सद्दावियानन्द सरस्वती

स्वामिनी सद्दावियानन्द सरस्वती जी ने दिसंबर 1980 में सूरत में स्वामी चिन्मयानन्द जी से हुई अपनी पहली मुलाकात को याद किया। उन्होंने बताया कि कॉलेज की पढ़ाई पूरी होने के बाद उनके पिताजी उन्हें गुरुदेव के पास श्रीमद भगवतगीता के 13वें अध्याय और ‘भज गोविन्दम्’ का श्रवण कराने ले गए थे। इस अध्ययन ने उनके जीवन पर गहरा प्रभाव डाला।

माइक्रोबायोलॉजी की छात्रा होने के कारण उनके मन में ब्रह्म और अस्तित्व के मूल स्वरूप को जानने की जिज्ञासा उत्पन्न हुई। उन्होंने कहा कि गुरुदेव की वाणी में ऐसी शक्ति थी, जो व्यक्ति को भीतर से जागृत कर देती थी।

उन्होंने कहा, “वेदांत किसी भी काल में पुराना नहीं होता, वह सदैव नूतन रहता है।” स्वामिनी जी ने बताया कि वेदांत के ज्ञान को सामान्य व्यक्ति तक पहुँचाने के लिए स्वामी चिन्मयानन्द जी ने अनेक परंपरागत धारणाओं और विरोधों के बावजूद पश्चिमी भाषा और आधुनिक प्रस्तुति शैली का प्रयोग किया, ताकि अधिक से अधिक लोग वेदांत को समझ सकें।

ज्ञान और एकात्मता की परंपरा को आगे बढ़ाने का आह्वान

कार्यक्रम में वक्ताओं ने कहा कि स्वामी चिन्मयानन्द सरस्वती जी ने अद्वैत वेदांत के गहन ज्ञान को सरल भाषा, आधुनिक दृष्टिकोण और प्रभावी संवाद शैली के माध्यम से समाज के व्यापक वर्ग तक पहुँचाया। उनका कार्य केवल आध्यात्मिक क्षेत्र तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उन्होंने शिक्षा, युवा जागरण और सामाजिक चेतना के माध्यम से भारतीय ज्ञान परंपरा को वैश्विक स्तर पर प्रतिष्ठित करने का कार्य किया।

आचार्य शंकर सांस्कृतिक एकता न्यास के न्यासी सचिव श्री शिव शेखर शुक्ला ने कहा कि शङ्कर व्याख्यानमाला अद्वैत दर्शन, आत्म-साक्षात्कार और भारतीय संस्कृति की समृद्ध परंपरा को गहराई से समझने का एक महत्वपूर्ण अवसर प्रदान करती है।

कार्यक्रम में बड़ी संख्या में धर्मप्रेमी, युवा, शोधार्थी, प्रबुद्धजन एवं वेदांत के जिज्ञासु उपस्थित रहे।

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