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सरकारी विद्यालय: कमियाँ गिनाने से नहीं,साथ खड़े होने से बदलेंगे हालात: जगदीश यादव

आज सोशल मीडिया के दौर में सरकारी विद्यालयों और शिक्षकों की छवि को लेकर जिस तरह अधूरी जानकारी, एकतरफा तस्वीरों और संदर्भविहीन वीडियो के माध्यम से नकारात्मक वातावरण बनाया जा रहा है, वह चिंताजनक है।सुधार के लिए सवाल उठाना आवश्यक है,लेकिन किसी पूरी व्यवस्था और पूरे शिक्षक समाज को कटघरे में खड़ा कर देना उचित नहीं।सबसे अधिक चिंता तब होती है, जब इस नकारात्मकता की चपेट में हमारे बच्चे भी आने लगते हैं।जिस उम्र में बच्चों के हाथ में कलम और किताब होनी चाहिए,उस उम्र में उन्हें विद्यालय की व्यवस्थाओं के सवालों में उलझाना उचित नहीं है।उनके बालमन की सरलता, उत्सुकता और भोलेपन का उपयोग किसी भी प्रकार के प्रचार, विवाद या राजनीति के लिए नहीं होना चाहिए।बच्चे व्यवस्था के आलोचक बनने के लिए नहीं,अपने भविष्य के निर्माता बनने के लिए विद्यालय आते हैं।विद्यालय में कोई कमी है तो उसे शिक्षक, अभिभावक, विभाग और समाज मिलकर दूर करें। बच्चों के कंधों पर व्यवस्था सुधारने का बोझ डालना उनके बचपन और शिक्षा—दोनों के साथ अन्याय है।पालकों से भी विनम्र आग्रह है—अपने बच्चों को हर वायरल वीडियो और हर उकसावे का हिस्सा बनने से बचाइए। उन्हें प्रश्न पूछना सिखाइए, लेकिन तथ्य समझकर; अधिकारों के प्रति जागरूक बनाइए, लेकिन जिम्मेदारी के साथ। किसी राजनीतिक स्वार्थ या प्रचार का माध्यम बनकर उनका भविष्य प्रभावित न हो, इसका ध्यान रखना भी हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है।याद रखिए—आज बच्चे के हाथ में कलम होगी तो कल वह अपना भविष्य लिखेगा;
आज उसके हाथ में किताब होगी तो कल वह समाज की दिशा तय करेगा।लेकिन यदि आज उसके हाथ में विवाद और नकारात्मकता थमा दी गई,तो कल उसके सपनों की कीमत कौन चुकाएगा ? सरकारी विद्यालयों में कमियाँ हैं तो उन्हें छिपाया नहीं जाना चाहिए। लेकिन सुधार का रास्ता बच्चों को आगे करके नहीं, बच्चों के लिए आगे बढ़कर बनाया जाना चाहिए।शिक्षक अपना दायित्व निभाएँ, विभाग अपनी जिम्मेदारी निभाए, समाज सहयोग करे और अभिभावक अपने बच्चों के भविष्य के प्रहरी बनें।आइए, बच्चों को व्यवस्था की लड़ाई का मोहरा नहीं, शिक्षा और भविष्य का निर्माता बनाएं।क्योंकि—“विद्यालय सुधारने का जिम्मा बड़ों का है,विद्यालय में अपना भविष्य संवारना बच्चों का।”और सरकारी विद्यालयों की सच्ची तस्वीर किसी एक वायरल वीडियो से नहीं, शिक्षक के समर्पण, बच्चे की उपलब्धि और समाज के विश्वास से बनती है…

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