टिकट, दमकल और जमीन: भोपाल को पहुंच का पूरा प्लान जरूरी – क्रेडाई
मेट्रो की छूट, न्यू मार्केट की आग और बायपास के भूमि नोटिस से निकला एक सवाल - विकास का लाभ लोगों तक कैसे पहुंचे?
शहर में मेट्रो का टिकट सस्ता हो रहा है, लेकिन स्टेशन तक पहुंच की चुनौती बनी हुई है। न्यू मार्केट की आग ने दमकल के रास्ते का सवाल उठाया है। पश्चिमी बायपास के लिए जमीन के नोटिस बता रहे हैं कि नई सड़क बनाते समय गांवों की पहुंच और जमीन मालिकों के अधिकार भी जरूरी हैं। इन अलग खबरों का साझा सवाल है रास्ते नक्शे से आगे लोगों के कितने काम आते हैं?
11 अक्टूबर से भोपाल मेट्रो के एकतरफा टिकट पर अतिरिक्त 25% छूट, वापसी के टिकट पर कुल 30% और ग्रुप टिकट पर 35% राहत की व्यवस्था घोषित हुई है। दो यात्री भी ग्रुप टिकट ले सकेंगे। लेकिन घर से मेट्रो स्टेशन तक बस नहीं मिले या आखिरी हिस्से की यात्रा महंगी पड़े तो छूट का पूरा लाभ नहीं मिलेगा। यही वजह है कि किराये के साथ फीडर बस, सुरक्षित फुटपाथ और पूरे सफर का समय और खर्च मापना जरूरी है।
दूसरी तरफ न्यू मार्केट की 8 अक्टूबर की आग में 5 दुकानों को नुकसान और दमकल को पहुंचने में 35 मिनट की देरी बताई गई है। वहां मुद्दा सिर्फ ट्रैफिक नहीं, किसी आपात स्थिति में रास्ता खुला रहने का है। बाजारों में अतिक्रमण, पार्किंग, बंद गेट और निर्माण की रुकावटों की अलग जांच शहर को ज्यादा सुरक्षित बना सकती है।
तीसरा उदाहरण वेस्टर्न बायपास है। 5 गांवों की हस्ताक्षरित सूचनाओं के मिलान से 53.6450 हेक्टेयर जमीन का प्रस्तावित अर्जन सामने आया है। दो सरकारी प्रतियों में टीलाखेड़ी के आंकड़े अलग हैं। लोगों को सही खसरा, सूचना की तारीख और दावा देने की प्रक्रिया आसानी से मिलनी चाहिए।
क्रेडाई अध्यक्ष मनोज मीक का ‘कमाल का भोपाल’ अभियान 2047 की योजना में सड़क, आवास, रोजगार, सार्वजनिक सुविधाएं और पर्यावरण को साथ देखने की पैरवी करता रहा है। संगठन का सुझाव है कि हर बड़ी परिवहन परियोजना का एक सार्वजनिक ‘पहुंच कार्ड’ बने। इसमें यात्री की पहली और आखिरी यात्रा, दमकल का रास्ता, गांव की क्रॉसिंग, भूमि-प्रक्रिया, जिम्मेदार विभाग और काम की समयसीमा दर्ज हो। क्रेडाई ने शनिवार को ही भोपाल मेट्रोपॉलिटन रीजन के विश्वस्तरीय विकास के लिए 126 पेज की रिपोर्ट बीडीए-सेप्ट को सौंपी है।
मनोज मीक ने कहा भोपाल की प्रगति के लिए विकास योजना में दर्ज सभी मार्ग निर्धारित मानकों पर समयसीमा में बनाए जाने चाहिए। केवल कितने किलोमीटर सड़क प्रस्तावित है या कितने टिकट बिके, इससे नहीं मापी जानी चाहिए। असली कसौटी है लोग कितने सुरक्षित, सस्ते और भरोसेमंद तरीके से अपने गंतव्य तक पहुंचते हैं।



