व्यंग्य
• रवि उपाध्याय
दिल्ली के भारत मंडपम में 16 फरवरी से आयोजित ग्लोबल एआई इंपैक्ट समिट का गत 20 फरवरी शुक्रवार को समापन हो गया। यानि समिट का आयोजन वैलेंटाइन वीक के समापन के एक दिन बाद हुआ। वैसे भी फरवरी – मार्च का जो महीना होता है वह मद भरा मौसम होता है । इस मौसम में आदमी तो आदमी पेड़ – पौधे तक बावले हो जाते हैं। इसकी शुरुआत बसंत ऋतु आने के साथ ही हो जाती है। कलियां चटकने लगतीं हैं। बाग-बगीचे रंग बिरंगे फूलों से महक उठते हैं। भंवरे गुन गुन करते हुए चमनों का चक्कर लगाने लगते हैं। ये मौसम का ही असर है कि प्रेमी प्रेमिकाओं के साथ आम भी बौरा जाता है। जब पूरा मौसम ही महक,चहक और बहक रहा हो तो ऐसे में इसका असर समिट पर पड़ना भी था और ऐसा हुआ भी।
इसका पहला असर समिट के तीसरे दिन 18 फरवरी को और 20 फरवरी को समिट के आख़िरी दिन उस समय नज़र आया। जब नोएडा की गलगोटिया यूनिवर्सिटी ने चीन के रोबो डॉग यूनिट्री गो- 2 को अपना प्रोडक्ट ‘ओरियन’ बता कर बड़ी शान से समिट में पेश कर दिया। उसके इस कारनामे ने यूनिवर्सिटी के नाम के अनुरूप पूरी दुनिया में देश और समिट दोनों का गला घोट दिया । इस हरकत के बाद इसे यदि इसे गला घोटिया यूनिवर्सिटी कहा जाए तो यह गलत नहीं होगा।
दुःख तो यह है कि गला घोटिया यूनिवर्सिटी ने इस झूठ को परोसने के लिए महिला प्रोफेसर्स को आगे किया और संस्था के सभी शीर्ष पदाधिकारी पर्दे के पीछे से अपने गढ़े गए फ्रॉड का तमाशा देखते रहे। संस्था के मालिकों ने महिला प्रोफेसर्स को कमांड देकर रोबो की तरह इस्तेमाल किया।
मजेदार बात यह है कि 2025 का साल डॉग वर्ष रहा है। इसका असर समिट में भी 18 फरवरी को भी रोबो डॉग के रूप में सामने आया।पिछले साल देश की सबसे बड़ी अदालत, देश की अदालतों में लाखों पेंडिंग पड़े प्रकरणों से अधिक चिंतित कुत्तों को लेकर रही है। उसे आदमी से अधिक कुत्तों की चिंता रही है। उसकी इस चिन्ता को कुत्तों का सौभाग्य कहा जाए या वर्षों से न्याय की प्रतिक्षा में तिल तिल कर मरते आदमी का दुर्भाग्य । यह चिंता और विमर्श का विषय है।
पर यह खुशी की बात है कि अदालतें आदमी और जानवर दोनों के साथ एक सा व्यवहार करतीं हैं। यह हमारी न्याय प्रणाली की खूबसूरती भी है। यह इस बात का भी द्योतक है कि हमारे देश का आम आदमी कितना सहिष्णु है जो कि न्याय पाने के लिए पुनर्जन्म तक का इंतजार करने को विवश हैं। शायद यही वह आशा है जो पुनर्जन्म की थ्योरी के क्रम को सर्कुलेशन में बनाए रखती है। अदालतें भी मानती हैं कि जो बे जुबान जीव सदियों से अपनी वफादारी के लिए मशहूर है उसके साथ इंसाफ पहले होना चाहिए। आदमी की वफादारी के तो कहना ही क्या ?
एक बात और कि डॉग में जो क्वालिटी होती है वह आदमी में नहीं पाई जाती है। वह अपने मालिक या कहिए पालने वाले को कभी नहीं काटता है। जबकि इंसान के साथ ऐसा कोई बंधन नहीं है। डॉग में यह एक कमी है कि वे आपस में एक दूसरे को नहीं काटते हैं। जबकि ऐसा करना ही इंसान की विशेषता है। वक्त पड़ने पर वह अपने परिचित या मित्र को भी काटने से परहेज नहीं करता है। हां दोनों में एक बात कॉमन यह है कि दोनों पालतू होते हैं। कुछ नेताओं के तो कुछ नियोक्ता के, कुछ पत्नी के तो कुछ प्रेमिका के, सब किसी न किसी के पालतू होते जरूर हैं।
रोबो डॉग और नेचरल डॉग में एक अंतर यह भी होता है कि रोबो डॉग में खुद का कोई दिमाग नहीं होता है। वह उतना ही काम करता है जितना उसकी प्रोग्रामिंग की जाती है। यही प्रवृति कुछ आदमियों में भी होती है। वह भी अपने दिमाग का उतना ही उपयोग करते हैं जितना उनकी प्रोग्रामिंग की गई हो। इसका ज्वलंत उदाहरण है एआई इंपैक्ट समिट के अंतिम दिन शुक्रवार,20 फरवरी की वह घटना है जिसमें 8- 10 लोगों ने दुनिया के 20 देशों के राष्ट्रपति एवं राष्ट्र प्रमुखों और 100 से अधिक देशों के प्रतिनिधियों के सामने अर्धनग्न प्रदर्शन कर देश को दुनियां में शर्मिंदा कर डाला । इन्होंने भी अपने दिमाग का उपयोग किए बिना वही काम किया, जिसकी प्रोग्रामिंग उनके बॉसेज द्वारा की गई थी।ऐसे लोग संवेदन शून्य होते हैं। इनको देख कर भगवान भी खुद पर अफसोस करता होगा।
ऐसे लोगों पर संस्कृत का यह श्लोक पूरी तरह फिट बैठता है येषां न विद्या न तपो न दानं, न ज्ञानं न शीलं न गुणो न धर्मः । ते मर्त्यलोके भुविभारभूता, मनुष्यरूपेण मृगाश्चरन्ति ॥ इस श्लोक का भावार्थ यह है कि ऐसे लोग जिनके पास न तो विद्या है, न तप है, न दान,न ज्ञान, न शील है, न गुण और न धर्म ही है,ऐसे लोग मृत्युलोक में भूमि पर मनुष्य रूप में विचरण करने वाले जानवर के समान हैं। एआई इंपैक्ट समिट में प्रदर्शन करने युवाओं को इस श्रेणी में रखा जा सकता है।
संस्कृत भाषा में एक श्लोक “जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी”। इसका अर्थ है माता और जन्मभूमि स्वर्ग से भी बढ़ कर महान है। यह बात देश भक्तों पर लागू होती है। लेकिन जिन लोगों ने इस करतूत को खुद को नंगा किया उसे देख सुन कर वो लोग खुद को कोस रहे होंगे कि क्या हमने इन बैल बुद्धि नमक हरामों के लिए हंसते हंसते हुए फांसी के फंदे को चूमा था।
विदेशों में जो रोबोट बनाए गए हैं सच कहें तो वे प्रोग्रामिंग किए गए कंप्यूटराइज स्टील के बॉक्स हैं। ऐसे ही लोगों को रोबो मेन कहा जाता है। जिनका आकार विचित्र सा होता है। जबकि हु ब हु मानव की शक्ल के रोबो बनाने के मामले में हिंदुस्तान ने दुनिया का पीछे छोड़ दिया है। इसका उदाहरण हैं सरकारी दफ्तर। यहां कर्मचारी उतना ही काम करते हैं जितना कमांड उनके बॉस उनको देते हैं। ये लोग अपना ब्रेन उससे ज्यादा नहीं चलाते हैं । यदि वे ऐसा करते हैं तो ऐसे लोग डिस्क्वालीफाइड घोषित हो जाते हैं। स्थिति ये होती है कि ऐसे लोग रिटायर्ड होने के बाद जब अपने घर पहुंचते हैं तो उनके सोचने समझने की पॉवर ही डेड हो चुकी होती है। ऐसे में पत्नी और बच्चों के सामने वे मूक बेकार बूढ़े टाइगर जैसे बैठे रहते हैं।
ऐसा नहीं है कि यह स्थिति केवल सरकारी दफ्तरों में ही हो। राजनीति में भी रोबो मेन या ब्रेनलेस मेन बहुतायत में पाए जाते हैं। राजनीति में कार्यकर्ता से लेकर छोटे,मँझले बड़े और सबसे बड़े रोबो की पॉवर के हिसाब से अलग अलग श्रेणी होती है। सबसे बड़ा जो नेता जो बोली बोलता है नीचे तक के सभी रोबोट को उसी तरह हुआ हुआ करना होता है। जैसे जंगल में एक सियार ने हुआ हुआ आवाज निकाली तो अन्य सियार भी वैसी ही हुआ हुआ की आवाज़ निकालने लगते हैं। राजनीति में इसे ही अनुशासन कहते हैं।
किंवदंती हैं कि डायन भी एक घर छोड़ कर वार करती है। परंतु कुछ प्रेत ऐसे भी होते हैं जो अपनी मारक विधा का यूज सबसे पहले अपने परिजनों पर कर के उन्हीं ही निशाना बनाते हैं। इन्होंने जिस घर में जन्म लिया होता है वे उसी में प्रेत बन कर वास करते हैं और उसे ही भुतहा घर बना देते हैं।

( लेखक व्यंग्यकार एवं एक राजनैतिक समीक्षक भी हैं। )
21022026



