राजनीतिक

विधानमंडल में पास हुए 12 संशोधन विधेयक में किसकी चर्चा सबसे अधिक? मनोनयन नहीं, अब गुप्त मतदान

बहुत कम मौके आते हैं, जब विधानमंडल में सत्ता और विपक्ष साथ-साथ हो जाएं। बिहार में ऐसा मौका बजट सत्र के दौरान एक संशोधन विधेयक को पेश किए जाने पर नजर आया। चर्चा अब भी गरम है कि आखिर क्यों? वजह यहां समझें

बिहार बजट सत्र के दौरान विधान मंडल के दोनों सदनों (विधानसभा और विधान परिषद्)  से 12 विधेयक पारित किए गए। इन बारहों विधयकों में सभी पर दोनों सदनों में चर्चा हुई। लेकिन, एक विधेयक की चर्चा पूरे बिहार में हो रही है। वह है नगर पालिका संशोधन विधेयक। इस विधेयक को लेकर दोनों सदनों में पक्ष और विपक्ष के नेताओं ने बातें की। दोनों सदनों में इस विधेयक को पारित कर दिया गया। इसके लिए कई महीनों से मांग उठ रही थी। सदन में भी पक्ष और विपक्ष के विधायक इसके लिए अपनी आवाज बुलंद कर रहे थे। जब विधेयक सदन के पटल पर रखा गया तो राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन और महागठबंधन के नेता इसके पक्ष में दिखे। आइए जानते हैं नए नगर पालिका संशोधन विधेयक 2026 के बारे में…। जानिए इस संशोधन विधेयक का क्या उद्देश्य है?
विधानसभा की ओर से दी गई जानकारी के अनुसार, बिहार नगरपालिका अधिनियम, 2007 में मुख्य पार्षद या उप मुख्य पार्षद का प्रत्यक्ष निर्वाचन पद्धति से निर्वाचित होने का प्रावधान है, उक्त प्रावधान के आलोक में मुख्य पार्षद या उपमुख्य पार्षद द्वारा विकास कार्य के लिए निर्णय लिया जाता है जिसमें उन्हें अधिक स्वायता प्रदान किए जाने की आवश्यकता है। मुख्य पार्षद या उप मुख्य पार्षद को अधिक स्वायता प्रदान किए जाने के उद्देश्य से बिहार नगरपालिका अधिनियम (संशोधित), 2024 के प्रावधान में संशोधन किया जाना आवश्यक है जिससे नगर निकाय के विकास के लिए मुख्य पार्षद या उप मुख्य पार्षद द्वारा त्वरित निर्णय लिया जा सके। यही इस विधेयक का उद्देश्य है। क्या है खास बात इस नए संशोधन विधेयक में
नगर पालिका संशोधन विधेयक में यह प्रावधान किया गया है कि नगर निकाय क्षेत्र के सांसद ओर विधायकों को भी गुप्त मतदान में शामिल होने का अधिकार दिया गया हे। इसमें लोकसभा और राज्यसभा के सदस्यों के साथ विधानसभा और विधान परिषद् के सदस्यों को अधिकार दिया गया है। अब यह गुप्त मतदान में शामिल होकर सशक्त स्थायी समिति के सदस्यों का चयन कर सकते हैं।

क्या बदला और क्यों संशोधन करना पड़ा?
नगर निकायों की स्थायी समिति के सदस्यों का चयन महापौर, मुख्य पार्षद और अध्यक्ष करते थे। इसमें आरोप लगता था कि महापौर और मुख्य पार्षद अपने करीबियों को स्थायी समिति में सदस्य बनाकर कार्यकारिणी पर नियंत्रण रखते थे। लेकिन, नए विधेयक में यह व्यवस्था खत्म कर दी गई। अब नगर निकायों की स्थायी समिति के सदस्य मनोनीत नहीं होंगे। पार्षद गुप्त मतदान से सदस्य चुनेंगे। मतदान जिला अधिकारी की निगरानी में होगा। सांसद विधायक और पार्षद प्रतिनिधि भेज पाएंगे।

डिप्टी सीएम ने बताया क्या आरोप लगते थे?
डिप्टी सीएम विजय कुमार सिन्हा ने कहा कि पहले के प्रावधानों के तहत सशक्त स्थायी समिति के सदस्यों का नामांकन निर्वाचित महापौर या अध्यक्ष द्वारा किया जाता है। लेकिन, व्यवहार में इसके गठन के दौरान कई तरह की समस्याएं सामने आती रहीं। उन्होंने कहा कि मौजूदा व्यवस्था में पक्षपात के आरोप लगते रहे। निर्वाचित पदाधिकारियों में से किसी एक या कुछ व्यक्तियों में अधिकारों का केंद्रीकरण हो जाता था। इससे शक्ति और उत्तरदायित्व का अप्रत्यक्ष रूप से संकेंद्रण होता था, जो संविधान की विकेंद्रीकरण की भावना के अनुरूप नहीं है।

‘सभी निर्वाचित प्रतिनिधियों की सहभागिता सुनिश्चित हो’
डिप्टी सीएम विजय कुमार सिन्हा ने स्पष्ट कहा कि इन परिस्थितियों को देखते हुए यह आवश्यक हो गया है कि सशक्त स्थायी समिति के गठन की प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और न्यायसंगत बनाया जाए। इसके लिए अधिनियम में उपयुक्त प्रावधान किए जाने की आवश्यकता सरकार को महसूस हुई ताकि सभी निर्वाचित प्रतिनिधियों की सहभागिता सुनिश्चित हो सके और निर्णय प्रक्रिया संतुलित हो। उन्होंने यह भी कहा कि नगरपालिका की बैठकों में कुछ वर्ग के सदस्यों को शामिल होने में व्यावहारिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। ऐसे सदस्यों के लिए उपयुक्त प्रावधान किया जाना जरूरी है, ताकि उनकी भागीदारी सुनिश्चित की जा सके। साथ ही, यदि कोई सदस्य बैठक में उपस्थित नहीं हो पाता है तो उसके प्रतिनिधि द्वारा बैठक में भाग लेने का प्रावधान भी किया जाना चाहिए। इससे कार्यों की निरंतरता बनी रहेगी और निर्णय प्रक्रिया बाधित नहीं होगी।

अब जानिए संशोधन की प्रमुख बातों को…

 

  • नगरपालिका प्रशासन के लिए कार्यपालक कृत्य मुख्य नगरपालिका अधिकारी में निहित होगा, जो सशक्त स्थायी समिति की निगरानी करेगा। इस अधिनियम के साथ-साथ इसके अंतर्गत बनाए गए नियमों, विनियमों, उप-विधियों के प्रावधानों के अधीन होगा।
  • नगरपालिका की प्रत्येक बैठक में पार्षदों और मुख्य नगरपालिका अधिकारी या उनके द्वारा नामित कोई अन्य अधिकारी के द्वारा भाग लिया जाएगा जबकि सीमित संख्या (सरकार द्वारा यथा निर्धारित) में दर्शक भी मुख्य नगर पार्षद की अनुमति से वहां उपस्थित हो सकते हैं।
  • कोई भी व्यक्ति जो मुख्य नगरपालिका अधिकारी या राज्य सरकार द्वारा विहित रूप से अधिकृत किसी अन्य अधिकारी के आदेश से असंतुष्ट हो तो वह ऐसे आदेश के 30 तीस दिनों के भीतर उस जिले के जिला न्यायाधीश के समक्ष अपील कर सकता है। जिसके अधिकार क्षेत्र में संबंधित नगरपालिका स्थित है, जिनका निर्णय अंतिम होगा।

‘वार्ड सदस्यों के लिए यह मांगें भी उठ रही’
राजद विधायक राहुल कुमार ने संविधान के 73वें और 74वें संशोधन में देश में पंचायती राज व्यवस्था कायम हुई। इसमें नगर निकायों को स्वायत्त संस्था बनाने की व्यवस्था की गई। लेकिन, इतने वर्ष बीत जाने के बावजूद नगर निकायों में वार्ड सदस्यों को कोई अधिकार नहीं है। सरकार उन्हें अधिकार दे। मुखिया को जैसे अधिकार मिले हैं, उसी तरह वार्ड सदस्यों को भी अधिकार मिले। उन्हें भी फंड मिलना चाहिए। लेकिन, वार्ड सदस्यों को कोई अधिकार नहीं मिला। इसलिए सरकार वार्ड सदस्यों को अधिकार दे, ताकि वह विकास का काम कर सके।
 ‘सरकार वार्ड सदस्य को यह अधिकार दे’
एमएलसी कुमार नागेंद्र ने कहा कि हमलोग चाहते हैं कि वार्ड सदस्यों को कुछ शक्तियां मिलनी चाहिए। मंत्री को इस पर जवाब देना चाहिए। मंत्री श्रवण कुमार ने कहा कि अप्रैल से नई नियमावली आने वाली है, उसमें सदस्यों की मांग पर केंद्र सरकार से अनुरोध करेंगे कि वार्ड सदस्यों को अधिकार दिया जाएग। एमएलसी महेश्वर सिंह ने कहा कि वार्ड सदस्य की तरह मुखिया को भी कोई अधिकार नहीं है। यहां तक कि वह एक सोलर लाइट तक नहीं लगा सकते हैं। पंचायती राज विभाग पटना से लाइट भेजते हैं। आखिर क्या घपला है? एमएलसी ने कहा कि सरकार से आग्रह है कि सरकार वार्ड सदस्य, मुखिया और सरपंच को अधिकार दे।

जानिए, कौन-कौन से विधेयक बजट सत्र के दौरान दोनों सदनों में हुए पारित

  • बिहार विनियोग विधेयक, 2026
  • बिहार विनियोग (संख्या 2) विधेयक, 2026
  • बिहार तकनीकी सेवा आयोग (संशोधन) विधेयक, 2026
  • बिहार कर्मचारी चयन आयोग (संशोधन) विधेयक, 2026
  • बिहार नगरपालिका (संशोधन),  2026
  • बिहार सिविल न्यायालय विधेयक, 2026
  • बिहार सचिवालय सेवा (संशोधन) विधेयक, 2026
  • बिहार सूक्ष्म वित्त संस्थाएं (धन उधार विनियमन एवं प्रतीड़क कार्रवाई निवारण) विधेयक, 2026
  • बिहार निजी व्यवसायिक शैक्षणिक संस्थान (नामांकन विनियमन एवं शुल्क निर्धारण) विधेयक, 2026
  • बिहार अधिवक्ता कल्याण निधि (संशोधन) विधेयक, 2026
  • बिहार जन विश्वास ( प्रावधान संशोधन) विधेयक, 2026
  • बिहार राज्य मदरसा शिक्षा बोर्ड (संशोधन) विधेयक, 2026

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button