अध्यात्म

क्या दोबारा इस्तेमाल किया जा सकता है भगवान को अर्पित की गई सामग्री, यहां जानिए शास्त्र के अनुसार क्या है नियम

 

 

अक्सर घरों में पूजा-पाठ के दौरान एक सवाल बार-बार सामने आता है क्या भगवान को अर्पित की गई सामग्री का दोबारा इस्तेमाल किया जा सकता है? कई लोग फूल, माला, अक्षत या जल को फिर से पूजा में उपयोग कर लेते हैं, लेकिन क्या यह सही है? क्या शास्त्र इसकी अनुमति देते हैं या इसे अशुद्ध माना जाता है?

हिंदू धर्म में पूजा की शुद्धता और पवित्रता को बहुत महत्वपूर्ण माना गया है. इसी वजह से शास्त्रों में पूजा सामग्री के पुनः उपयोग को लेकर कुछ स्पष्ट नियम बताए गए हैं. जिनका पालन करना आवश्यक माना जाता है.

पूजा का पूरा फल नहीं मिलता

शास्त्रों में उस सामग्री को ‘निर्माल्य’ कहा गया है, जो एक बार भगवान को अर्पित की जा चुकी हो. नियम के अनुसार जो फूल, माला या अक्षत भगवान को चढ़ा दिए जाते हैं. वे उनके प्रसाद का हिस्सा बन जाते हैं. ऐसी सामग्री को दोबारा धोकर या साफ करके दूसरी पूजा में इस्तेमाल करना अशुद्ध माना गया है. मान्यता है कि ऐसा करने से पूजा का पूरा फल प्राप्त नहीं होता.

जल और दीपक को लेकर भी नियम

पूजा में इस्तेमाल होने वाला जल भी हमेशा ताजा होना चाहिए. अगर कलश में रखा जल किसी कारण अशुद्ध स्पर्श में आ जाए, तो उसे फिर से पूजा में उपयोग नहीं करना चाहिए. तांबे या पीतल के बर्तनों को हर पूजा के बाद शुद्ध मिट्टी या नींबू से साफ करना जरूरी माना गया है. इसी तरह दीपक जलाते समय पुराने दीये की जली हुई बत्ती और बचा हुआ तेल हटाकर ही नया दीपक जलाना चाहिए.

इन्हें पुनः इस्तेमाल किया जा सकता है

शास्त्रों में कुछ अपवाद भी बताए गए हैं. गंगाजल को कभी बासी नहीं माना जाता है. इसलिए इसका बार-बार उपयोग किया जा सकता है. तुलसी के पत्तों को भी विशेष परिस्थितियों में धोकर दोबारा भगवान को अर्पित किया जा सकता है. इसी तरह भगवान की मूर्ति, शालिग्राम, घंटी, शंख, मंत्र जाप की माला और पूजा के धातु के पात्रों को धोकर फिर से उपयोग किया जा सकता है.

इन्हें भी दोबारा इस्तेमाल नहीं करना चाहिए

मान्यता है कि भगवान शिव को चढ़ाया गया बेलपत्र भी धोकर दोबारा अर्पित किया जा सकता है. बशर्ते वह खंडित या दागदार न हो. वहीं फूल, माला, भोग, चंदन, कुमकुम, धूप-दीप, नारियल, अक्षत या दीपक में बचा तेल दोबारा उपयोग नहीं करना चाहिए. पूजा में उपयोग की गई सामग्री का सम्मान करना ही धार्मिक नियमों का पालन माना जाता है.

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